इंसाफ की लड़ाई में खाकी हुई शर्मसार ! माँ को मिलेगा इंसाफ? 28 पुलिसकर्मी सस्पेंड, क्या एसपी-डीएसपी पर भी होगी कार्रवाई ?
बोकारो। झारखण्ड के बोकारो से दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है।जिस 18 साल की बेटी के घर लौटने की उम्मीद में एक परिवार महीनों से दरवाजे पर आंखें बिछाए बैठा था,शनिवार को उसकी केवल हड्डियाँ और अवशेष बरामद हुए। यह महज एक हत्या नहीं, बल्कि सिस्टम की उस सड़न का सबूत है जिसने एक बेबस परिवार को न्याय के लिए दर-दर भटकने पर मजबूर कर दिया।
यह मामला तब तक फाइलों में दबा रहा जब तक झारखण्ड हाईकोर्ट ने पुलिस की सुस्ती पर कड़ा रुख नहीं अपनाया।कोर्ट की फटकार के बाद जब सीआईडी अधिकारी संध्या रानी मेहता ने खुद जांच की कमान संभाली, तो पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। जो केस महीनों से ‘लापता’ की श्रेणी में था, वह अचानक एक खौफनाक हत्याकांड में तब्दील हो गया।
इस मामले में पुलिस की भूमिका सबसे ज्यादा संदिग्ध रही है। आरोप है कि पीड़ित परिवार जब एफआईआर दर्ज कराने गया, तो उन्हें प्रताड़ित किया गया और मुख्य आरोपियों को बचाने की कोशिश की गई।
सूत्रों के अनुसार, जिले के एसपी और डीएसपी की भूमिका की भी गहन जांच हो रही है। गृह विभाग और सीआईडी इस बात की पड़ताल कर रहे हैं कि इतने महीनों तक जमीनी स्तर पर सूचनाओं को क्यों दबाया गया। क्या यह सिर्फ लापरवाही थी या किसी ‘पावरफुल’ अपराधी को बचाने का सुनियोजित खेल?
मृतक की माँ ने कहा-मेरी बेटी मासूम थी, उसका क्या दोष था? हमें अब इस भ्रष्ट सिस्टम की हकीकत समझ आ गई है।ताकतवर लोगों के लिए हमारी जान की कोई कीमत नहीं है, लेकिन हम हार नहीं मानेंगे।
इधर,रेत और झाड़ियों के बीच से बरामद हुए नरकंकाल ने बोकारो पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एफआईआर में देरी क्यों हुई? पीड़ित परिवार को ही पुलिस ने क्यों डराया? क्या रसूखदार आरोपियों के दबाव में थे अफसर?
बोकारो की इस बेटी के अवशेषों ने पूरे झारखण्ड को झकझोर दिया है। 28 पुलिसकर्मियों का निलंबन तो सिर्फ शुरुआत है, असली इंसाफ तब होगा जब पर्दे के पीछे बैठे उन ‘सफेदपोशों’ और ‘वर्दीधारियों’ के चेहरों से नकाब उतरेगा जिन्होंने एक अपराधी को संरक्षण दिया।वहीं जिले के आम आम लोगों में पुलिस की कार्यशैली पर काफी नाराजगी है।

