झारखण्ड पुलिस की इनामी महिला नक्सली पुष्पा महतो ने कोलकाता में किया सरेंडर
राँची/कोलकाता। झारखण्ड-बंगाल-ओडिसा सीमा क्षेत्र में पिछले 21 वर्षों से सक्रिय रही झारखण्ड पुलिस की इनामी महिला नक्सली शकुंतला उर्फ पुष्पा महतो ने बुधवार को कोलकाता के लालबाजार स्थित पुलिस मुख्यालय में हथियार के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। कभी जंगल और बंदूक की दुनिया का हिस्सा रही पुष्पा ने अब मुख्यधारा में लौटकर सामान्य जीवन जीने की इच्छा जताई है।पुष्पा महतो, जिन्हें संगठन में शंकुतला, परी और वर्षा जैसे नामों से जाना जाता था, लंबे समय तक माओवादी नेता असीम मंडल की टीम में सक्रिय रहीं। उनके खिलाफ झारखण्ड के कई थानों में हत्या, नक्सली हिंसा और विध्वंसक गतिविधियों से जुड़े मामले दर्ज हैं। सांसद सुनील महतो हत्याकांड और बुरूडीह लैंडमाइन विस्फोट जैसे चर्चित मामलों में भी उनका नाम सामने आया था।
10 लाख की महिला इनामी नक्सली ने कोलकाता में सरेंडर कर दिया है।महिला माओवादी ने बुधवार को कोलकाता पुलिस के समक्ष एक हथियार और 46 कारतूस जमा किये। कोलकाता के पुलिस कमिश्नर अजय कुमार नंद ने बताया कि महिला माओवादी का नाम शकुंतला उर्फ पुष्पा महतो है। उसने लालबाजार स्थित कोलकाता पुलिस मुख्यालय में आत्मसमर्पण किया। उसके पुनर्वास और कानूनी औपचारिकताएं सरकार की नीति के अनुसार पूरी की जायेंगी।पुलिस कमिश्नर ने बताया कि सरेंडर करने वाली शकुंतला भाकपा (माओवादी) की जोनल कमेटी की सदस्य थी। वर्षों तक कई माओवादी गढ़ों में सक्रिय रही। उसका आत्मसमर्पण नक्सल आंदोलन के घटते प्रभाव को दर्शाता है।पश्चिम बंगाल के झारग्राम जिले के बेलपहाड़ी की रहने वाली शकुंतला महतो वर्ष 2001 में माओवादी संगठन में शामिल हुई थी।
11 साल की उम्र में छोड़ा घर, जंगल को बना लिया ठिकाना
पश्चिम बंगाल के बेलपहाड़ी थाना क्षेत्र के मेछुआ गांव में किसान परिवार में जन्मी पुष्पा महतो तीन बहनों और एक भाई में सबसे बड़ी हैं। परिवार के मुताबिक, कम उम्र में ही वह अपने चाचा और माओवादी नेता युधिष्ठिर महतो उर्फ अर्जुन के प्रभाव में आ गईं। पहले संगठन की सांस्कृतिक इकाई से जुड़ीं और बाद में हथियारबंद दस्ते की सक्रिय सदस्य बन गईं।
नक्सल संगठन में प्रेम, शादी और फिर बिछड़ने की कहानी
वर्ष 2005 में पुष्पा बंगाल छोड़ झारखण्ड के घाटशिला, गालूडीह, धालभूमगढ़ और चाकुलिया इलाकों में सक्रिय हुईं। इसी दौरान संगठन के नेता अतुल महतो से उनका प्रेम हुआ और दोनों ने विवाह कर लिया। हालांकि शादी के दो साल बाद ही एक पुलिस मुठभेड़ में अतुल महतो मारे गए। इसके बावजूद पुष्पा ने संगठन नहीं छोड़ा।साल 2012 में उनके चाचा युधिष्ठिर महतो भी पुलिस मुठभेड़ में मारे गए। इसके बाद भी वह सारंडा समेत कई जंगल क्षेत्रों में सक्रिय रहकर संगठन की गतिविधियों से जुड़ी रहीं।
पुलिस की वांटेड सूची में था नाम
झारखण्ड पुलिस द्वारा जारी वांटेड नक्सलियों की सूची में पुष्पा महतो का नाम शामिल था। उन पर सरकार ने इनाम भी घोषित कर रखा था। लंबे समय तक सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बनी रहीं पुष्पा आखिरकार अब हथियार छोड़ने का फैसला कर चुकी हैं।
आत्मसमर्पण के बाद पुष्पा महतो ने कहा कि मुख्यधारा में लौटकर उन्हें अच्छा महसूस हो रहा है। उन्होंने कहा कि माओवादी आंदोलन अब अपनी प्रासंगिकता खो चुका है और जंगलों में सक्रिय लोगों को भी हथियार छोड़कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ना चाहिए।
पुष्पा के छोटे भाई अमिय महतो ने बताया कि जब उनकी बहन घर छोड़कर गई थीं तब उनकी उम्र सिर्फ 11 साल थी और वह खुद मात्र चार साल के थे। वर्षों तक पुलिस की पूछताछ और छापेमारी से परिवार को परेशानियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि अब दीदी के लौटने से पूरा परिवार खुश है और उम्मीद है कि उनके जीवन में शांति और स्थिरता का नया दौर शुरू होगा।
दो दशक तक जंगल की जिंदगी जीने वाली पुष्पा महतो की यह घर वापसी सिर्फ एक आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि हिंसा से संवाद और बंदूक से समाज की ओर लौटने की कहानी बन गई है।

