राँची रेलवे स्टेशन पर वन्यजीव तस्करी का खुलासा, पांच सांपों के साथ दो हिरासत में..

राँची। रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर रखी बांस की टोकरियां देखने में बिल्कुल सामान्य थीं। किसी को अंदाजा नहीं था कि इन टोकरियों के भीतर दुर्लभ और संरक्षित वन्यजीवों को छिपाकर ले जाया जा रहा है।राँची रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म संख्या एक पर नियमित जांच के दौरान आरपीएफ की नजर इन टोकरियों पर पड़ी। संदेह के आधार पर जब उनकी तलाशी ली गई तो अंदर का नजारा देखकर जवान भी हैरान रह गए।टोकरियों के भीतर दो रेड सैंड बोआ (दोमुंहे सांप) और तीन चश्माधारी नाग (इंडियन कोबरा) मिले। पांच सांपों के साथ दो लोगों को आरपीएफ ने हिरासत में लिया। पूछताछ में उनकी पहचान आनंद नाथ और अर्जू के रूप में हुई।
आरपीएफ के मुताबिक, दोनों आरोपी सांपों को जंगल से पकड़कर ले जा रहे थे। शुरुआती पूछताछ में सामने आया कि उनका उद्देश्य इन सांपों का सार्वजनिक प्रदर्शन कर लोगों से पैसे कमाना था। सांपों को बांस की टोकरियों में छिपाकर रखा गया था, ताकि सामान्य जांच में उन पर आसानी से किसी की नजर न पड़े।
वन्यजीवों की तस्करी और उनके शोषण के खिलाफ चलाए जा रहे ऑपरेशन डब्ल्यूआइएलइपी (वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन) के तहत आरपीएफ राँची पोस्ट की टीम ने यह कार्रवाई की।
तीन नागों के टूटे मिले दांत, विष निकालने की आशंका
बरामद तीन चश्माधारी नागों में से कुछ के दांत टूटे हुए पाए गए। इस तथ्य ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। आरपीएफ को आशंका है कि सांपों से विष निकालकर उसे बेचने के लिए उनके दांत तोड़े गए होंगे।वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए यह पहलू खास चिंता का विषय है, क्योंकि सांपों को पकड़कर उनके विष का अवैध दोहन न केवल वन्यजीवों के साथ क्रूरता है, बल्कि इससे सांपों के जीवित रहने की संभावना भी प्रभावित होती है।
आखिर क्यों खास है रेड सैंड बोआ?
रेड सैंड बोआ को आम बोलचाल में दोमुंहा या मटिया सांप भी कहा जाता है। इसका शरीर मोटा और लाल-भूरे रंग का होता है। इसकी पूंछ का हिस्सा भी गोल और मोटा दिखाई देता है, जिससे यह दूर से दो सिर वाला सांप जैसा नजर आता है। हालांकि वास्तविकता यह है कि इसका मुंह केवल एक ही होता है।
यह सांप विषहीन होता है और आम तौर पर सूखी, रेतीली तथा ढीली मिट्टी वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। इसकी लंबाई करीब ढाई फीट तक हो सकती है।
दिलचस्प बात यह है कि रेड सैंड बोआ को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में कई तरह की अंधविश्वासी धारणाएं और झूठी कहानियां प्रचलित हैं। तस्कर इसके शरीर के अंगों को कैंसर के इलाज, पारंपरिक दवाओं और यौन शक्ति बढ़ाने में उपयोगी बताकर लोगों को गुमराह करते हैं। जबकि इसके किसी औषधीय उपयोग का प्रमाण नहीं है। इन्हीं अफवाहों के कारण यह सांप अवैध वन्यजीव व्यापार का निशाना बनता रहा है।
चश्माधारी नाग कितना खतरनाक?
बरामद तीनों नाग भारतीय नाग की प्रजाति के हैं। फन के पीछे मौजूद चश्मे जैसे निशान के कारण इन्हें चश्माधारी नाग कहा जाता है। यह विषैला सांप है और इसके विष में ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं।इसके काटने की स्थिति में गंभीर विषाक्तता होने पर मांसपेशियों में कमजोरी और सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। हालांकि समय पर चिकित्सकीय उपचार और उचित एंटीवेनम मिलने पर पीड़ित की जान बचाई जा सकती है। इसके विष का उपयोग एंटीवेनम तैयार करने के साथ चिकित्सा अनुसंधान में भी किया जाता है।
संरक्षण कानून के दायरे में आते हैं दोनों प्रजातियां
रेड सैंड बोआ और चश्माधारी नाग दोनों ही संरक्षित वन्यजीव हैं। इन्हें जंगल से पकड़ना, अपने कब्जे में रखना, उनका प्रदर्शन करना या अवैध तरीके से उनका व्यापार करना कानूनन अपराध है। वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास से निकालकर इस तरह आर्थिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण दोनों के लिए गंभीर चुनौती है।आरपीएफ ने आवश्यक कानूनी और विभागीय प्रक्रिया पूरी करने के बाद दोनों व्यक्तियों, बरामद पांचों सांपों और संबंधित दस्तावेजों को आगे की कार्रवाई के लिए वन परिक्षेत्र पदाधिकारी, टिम्बर डिपो रेंज, रांची को सौंप दिया।
आरपीएफ की टीम की रही अहम भूमिका
पूरी कार्रवाई में आरपीएफ राँची पोस्ट के निरीक्षक शिशुपाल कुमार, उपनिरीक्षक कमल दास, सहायक उपनिरीक्षक शक्ति सिंह तथा बल सदस्य सुचंद अहीर और आरएल मुंडा की महत्वपूर्ण भूमिका रही।राँची स्टेशन पर हुई यह कार्रवाई एक बार फिर यह बताती है कि वन्यजीव तस्कर किस तरह सामान्य सामान की आड़ में संरक्षित जीवों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं। बांस की साधारण दिखने वाली टोकरियों के भीतर छिपे पांच सांपों की बरामदगी ने न केवल तस्करी के तरीके को उजागर किया है, बल्कि वन्यजीवों के अवैध प्रदर्शन और उनके कथित विष दोहन जैसे गंभीर पहलुओं को भी सामने ला दिया है।

