राजनीति: “झारखण्ड में भी फट सकता है एक-आध एटम बम” इस बयान के बाद चढा राजनीतिक पारा……

राज्यपाल के बयान के बाद झारखंड में चढ़ा राजनीतिक पारा

राँची।झारखण्ड के राज्यपाल रमेश बैस के बयान के बाद राज्य में चढ़ा राजनीतिक पारा।”झारखण्ड में भी फट सकता है एक-आध एटम बम” झारखण्ड की राजनीति में राज्यपाल के इस बयान ने राजनीतिक गर्मी पैदा कर दी है। लंबे समय से शांत रही राजनीतिक चर्चा एक बार फिर तेज हो गयी है। सवाल वही पुराना, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की कुर्सी रहेगी या जायेगी ? इस सवाल का जवाब अब खनिज लीज से जुड़े मामले में चुनाव आयोग की दूसरी राय में होगा। राज्यपाल रमेश बैस ने इस मामले पर रायपुर में पत्रकारों से खुलकर बात की है। रायपुर में हुई इस बातचीत का सीधा असर झारखण्ड की राजनीति पर पड़ा है।

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने कहा बम बंदूक का जवाब तीर धनुष से देते रहे हैं झारखण्डी।जेएमएम प्रवक्ता तनुज खत्री ने कहा, राज्यपाल के इस बयान से साफ हो गया कि देश की संवैधानिक संस्था का इस्तेमाल केंद्र कर रहा है। राज्यपाल ने सेकेंड ओपिनियन के लिए भेजा है। एक बार जब चुनाव आयोग ने इस पर अपनी राय दे दी, तो फिर क्यों चुनाव आयोग से राय मांगी गयी ? साफ है कि इससे चुनाव आयोग के मंतव्य को बदलने की कोशिश है।केंद्र अपना राजनीतिक फायदा देख रहा है जाहिर है कि पहले वाले चुनाव आयोग के मंतव्य में कोई ऐसी बात नहीं होगी क्योंकि भारतीय जनता पार्टी ऐसी पार्टी है, जो रातों रात सरकार बनाती और बिगाड़ती है। अगर चुनाव आयोग के मंतव्य में ऐसा कुछ होता तो भाजपा अब तक चुप नहीं होती। इस मामले में जितना भी ओपिनियन ले लें, जनता ने जो ओपिनियन दिया है वह पांच सालों के लिए दिया है। झारखण्ड प्राकृतिक रूप से अपनी पहचान रखता है और यहां के लोग तीर – धनुष चलाना जानते हैं। इतिहास गवाह है कई बम का जवाब तीर – धनुष से दिया गया है।

कांग्रेस ने कहा, राजभवन को राजनीति का अखाड़ा ना बनाया जाए

कांग्रेस का पक्ष रखते हुए प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने कहा, इस मामले पर अब तक फैसला आ जाना चाहिए था। संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के द्वारा बयानबाजी गंभीर मामला है।इसमें यही लग रहा है कि फैसले को अपने अनुसार बदलने की कोशिश है। राजभवन को राजनीति का अखाड़ा नहीं बनाया जाना चाहिए। एक नहीं राज्यपाल चाहें, तो चुनाव आयोग से दस बार मंतव्य ले लें लेकिन गर्वनर की ओर से बयानबाजी उचित नहीं है।

भाजपा ने कहा, झामुमो के नेताओं को माफी मांगनी चाहिए
भारतीय जनता पार्टी ने इस पूरे मामले पर झामुमो के नेताओं के बयानबाजी पर सवाल खड़ा करते हुए कहा, उन नेताओं को माफी मांगनी चाहिए, जो राज्यपाल पर आरोप लगा रहे थे।भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने कहा, राज्यपाल के बयान पर टिप्पणी करने का अधिकार किसी राजनीतिक दल को नहीं है। मैं भी उनके बयान पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता लेकिन झारखण्ड मुक्ति मोरचा बार- बार राज्यपाल पर आरोप लगा रहा था लेकिन राज्यपाल ने नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत से एक कदम आगे बढ़कर चुनाव आयोग से दोबारा मंतव्य मांगा है। राज्यपाल पर बदले की भावना से कार्रवाई करने का आरोप लगाने वाले नेताओं को माफी मांगनी चाहिए। इससे ज्यादा पारदर्शी तरीका और क्या हो सकता है।

मुख्यमंत्री ने पहले ही कहा, जल्द करें फैसला

इस मामले को लेकर राज्य की राजनीति लंबे समय से गर्म है, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी इस मामले जल्द फैसला सुनाने की मांग करते हुए पहले ही कहा था,देश की यह पहली घटना है, जब सजा सुनने वाला राज्यपाल से गुहार लगा रहा है कि मेरी सजा तो बताओ। अगर मैं असंवैधानिक तरीके से मुख्यमंत्री पद पर बैठा हूं तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है। केंद्र सरकार मेरे खिलाफ अपनी असीम ताकत का दुरुपयोग कर रही है। आसमान को जमीन से मिलाने का प्रयास किया जा रहा है।

सदस्यता गई तो आगे क्या?

अगर हेमंत सोरेन की सदस्यता रद्द होती है तो उन्हें इस्तीफा देकर फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ लेनी होगी। इसके बाद 6 महीने के अंदर उन्हें दोबारा विधानसभा चुनाव जीतना होगा। अगर चुनाव लड़ने के लिए उन्हें अयोग्य घोषित किया जाता है तो उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना होगा। ऐसे में वे परिवार या पार्टी से किसी को कमान सौंप सकते हैं।

हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं

झारखण्ड हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील ए. अल्लाम ने एक अखबार के पत्रकार को बताया कि चुनाव आयोग अगर किसी विधायक या मंत्री को लाभ का पद रखने के मामले में दोषी पाता है तो उनकी सदस्यता समाप्त कर सकता है। उन्होंने बताया कि सदस्यता रद्द होने पर वे इस मामले में हाईकोर्ट में अपील कर सकते हैं। आर्टिकल-32 के मामले में सीधे सुप्रीम कोर्ट में भी अपील कर सकते हैं, लेकिन ये सभी विकल्प चुनाव आयोग का फैसला आने के बाद ही निर्भर करता है।

UPA खेमे में चर्चा, हेमंत का विकल्प कौन?

चुनाव आयोग के फैसले के दोनों पक्षों को लेकर UPA ​​​​​रेडी मोड में हैं। अगर फैसले से सोरेन की राजनीतिक सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा तो सत्तापक्ष कम्फर्टेबल मोड में रहेगा। दूसरी तरफ झामुमो इस बात को लेकर बेचैन है कि अगर कमीशन का फैसला सोरेन के खिलाफ गया तो ऐसी स्थिति में उनके विकल्प के रूप में किसे चुना जा सकता है। हालांकि, इसको लेकर पार्टी और UPA प्लेटफार्म पर अनौपचारिक रूप से तीन नामों की चर्चा हुई है।

उसमें सबसे पहला नाम सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन का है। दूसरे और तीसरे नंबर पर जोबा मांझी और चम्पई सोरेन हैं। दोनों सोरेन परिवार के काफी करीबी और विश्वस्त हैं। कांग्रेस ने भी इन नामों पर अभी तक नहीं किसी तरह की आपत्ति नहीं जताई है।

क्या है खनन पट्टे का मामला?

10 फरवरी को पूर्व CM रघुवर दास के नेतृत्व में BJP के एक डेलिगेशन ने गवर्नर से मुलाकात कर CM सोरेन की सदस्यता रद्द करने कि मांग की थी। BJP ने आरोप लगाया था कि CM सोरेन ने पद पर रहते हुए अनगड़ा में खनन पट्टा लिया है। BJP का आरोप है कि यह लोक जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RP) 1951 की धारा 9A का उल्लंघन है।
साभार: