40 साल बाद अपनों से मिले बिछड़े मदन साहू,परिजनों से मिलने के बाद छलके खुशी के आंसू..
चाइबासा।झारखण्ड के पश्चिम सिंहभूम जिले के नोवामुंडी से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने हर किसी के दिल को छू लिया। 40 साल पहले अपने परिवार से बिछड़े बुजुर्ग मदन साहू आखिरकार अपने परिजनों से मिल गए यह मिलन इतना भावुक था कि परिवार के सदस्यों की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। यह घटना न सिर्फ एक परिवार के लिए सुखद पल बनी, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा का उदाहरण भी बन गई।
इस पूरे मामले की शुरुआत नोवामुंडी थाना क्षेत्र में प्रकाशित एक खबर से हुई। खबर सामने आने के बाद जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डालसा) चाईबासा ने इस पर संज्ञान लिया।प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह डालसा अध्यक्ष मौहम्मद शाकिर के मार्गदर्शन और सचिव रवि चौधरी के नेतृत्व में पैरालीगल वालंटियर्स की टीम गठित की गई, जिसने बुजुर्ग की पहचान और उनके परिवार की तलाश का जिम्मा उठाया।
पैरालीगल वालंटियर्स की टीम ने लगातार प्रयास और विभिन्न एजेंसियों के समन्वय से बुजुर्ग मदन साहू के परिजनों का पता लगाया।यह काम आसान नहीं था, क्योंकि चार दशक का लंबा समय बीत चुका था और संपर्क के सभी पुराने सूत्र टूट चुके थे लेकिन टीम की लगन और समर्पण के चलते आखिरकार परिवार तक पहुंच संभव हो सकी
जब मदन साहू अपने परिवार से मिले, तो वह पल बेहद भावुक था।उनके बेटे कुनू साहू ने कहा, “हमने कभी सोचा भी नहीं था कि 40 साल बाद अपने पिता को फिर से देख पाएंगे डालसा की इस पहल ने हमारी जिंदगी में नई खुशी भर दी है ” परिवार के अन्य सदस्य भी इस मिलन से बेहद भावुक नजर आए और पूरे घर में खुशी का माहौल बन गया।
इस सफलता के पीछे कई संस्थाओं और लोगों का योगदान रहा। टाटा स्टील फाउंडेशन, नोवामुंडी पुलिस और अंचल कार्यालय ने इस मिशन में सक्रिय सहयोग दिया।इसके अलावा उमर सादिक, प्रमिला पात्रा, विनिता सांडिल, रेनु देवी, सोमा बोस, पूनम देवी, सूरज ठाकुर, रविकांत ठाकुर और संजय निषाद जैसे कई लोगों ने इस कार्य को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
डालसा चाईबासा की यह पहल समाज के कमजोर और असहाय वर्गों के प्रति उसकी संवेदनशीलता को दर्शाती है। इस घटना ने यह साबित कर दिया कि अगर सही दिशा में प्रयास किया जाए, तो वर्षों पुरानी दूरी भी मिटाई जा सकती है। यह पहल न केवल प्रशासनिक संवेदनशीलता का उदाहरण है, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण की भी मिसाल है।
यह घटना समाज को एक सकारात्मक संदेश देती है कि संवेदनशीलता, समन्वय और इच्छाशक्ति के बल पर असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। 40 साल का लंबा इंतजार खत्म होने के बाद जिस तरह एक परिवार फिर से एक हुआ, वह हर किसी के लिए उम्मीद और विश्वास का प्रतीक बन गया है।यह भावुक मिलन लंबे समय तक लोगों के दिलों में यादगार बना रहेगा और समाज को मानवीय मूल्यों की अहमियत का एहसास कराता रहेगा।

