राँची में सनसनी: धुर्वा पुलिस के ‘जुल्म’ से हारा प्रधान! 5 पन्नों का सुसाइड नोट खोल गया खाकी के खौफनाक राज-
–एएसआई साहब जज बनकर कर रहे थे फैसला…” मरने से पहले चालक ने रो-रो कर लिखी बेबसी की दास्तान”, पुलिस महकमे में हड़कंप…
राँची।झारखण्ड की राजधानी राँची से एक ऐसी खौफनाक और दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है, जिसने कानून के रखवालों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। राँची के धुर्वा थाना क्षेत्र के डीटी खटाल के पास रहने वाले एक सीधे-साधे ड्राइवर प्रधान यादव ने मौत को गले लगा लिया है। लेकिन यह सिर्फ एक आत्महत्या नहीं, बल्कि खाकी की कथित प्रताड़ना और सिस्टम की बेरुखी से तंग आकर उठाया गया आत्मघाती कदम है।मरने से पहले प्रधान यादव ने 5 पन्नों का एक ऐसा सुसाइड नोट छोड़ा है, जो धुर्वा पुलिस के चेहरे पर लगे ‘रक्षक’ के मुखौटे को उतारने के लिए काफी है। इस सुसाइड नोट में सीधे तौर पर केस के आईओ (तफ्तीश करने वाले अधिकारी) जमादार लालमोहर पांडेय और उनके सहयोगी जितेंद्र टुडू का नाम लिखा गया है।
लोहे की रॉड-तलवारों से पिटा परिवार,थाने पहुंचे तो खुद ही बन गए ‘मुजरिम’
सुसाइड नोट में छिपे दर्द की कहानी बीते 5 जून से शुरू होती है। प्रधान यादव के मुताबिक, पड़ोस में रहने वाले स्वर्गीय यादव के चार बेटों (धर्मेंद्र, जितेंद्र, जितेलेश और उनका एक भाई) ने मामूली बात पर प्रधान के परिवार पर लाठी-डंडों, लोहे की रॉड, तलवार और भालों से जानलेवा हमला कर दिया। इस खूनी खेल में प्रधान यादव, उनकी पत्नी और बुजुर्ग पिता लहूलुहान हो गए।
सुसाइड नोट का सबसे दर्दनाक हिस्सा:
“जब हम लहूलुहान हालत में न्याय की भीख मांगने धुर्वा थाना पहुंचे, तो वहां का नजारा ही बदल गया। पुलिस ने आरोपियों पर कार्रवाई करने के बजाय हमें ही दोषी ठहराना शुरू कर दिया। एएसआई लालमोहर पांडेय पुलिसवाले नहीं, बल्कि खुद जज बनकर हमारा फैसला करने लगे।”
मृतक प्रधान यादव ने अपनी मौत का वारंट लिखने से पहले पुलिस और अपराधियों के बीच के उस गंदे गठजोड़ का भी पर्दाफाश किया है, जिसे सुनकर किसी की भी रूह कांप जाए। सुसाइड नोट के मुताबिक, जिन दबंगों ने प्रधान के परिवार को पीटा, वे धुर्वा बस स्टैंड में चाय और खाने का होटल चलाते हैं। आरोप है कि पुलिस के संरक्षण में वहां धड़ल्ले से अवैध कारोबार होता है, और इसी ‘मलाई’ के बदले पुलिसकर्मियों ने पीड़ितों को ही प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।
हार मानकर प्रधान यादव समझौता करने को भी तैयार हो गया था, लेकिन पुलिसिया प्रताड़ना का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा था। बीती 14 जून को बीएनएस की धारा 35(3) के तहत उसे नोटिस थमाकर एक हफ्ते में पक्ष रखने को कहा गया,जिससे वह बुरी तरह टूट गया और उसने मौत का रास्ता चुन लिया।
दोषी या बेकसूर? आईओ लालमोहर पांडेय की सफाई:
इस पूरे मामले पर जब आरोपी आईओ लालमोहर पांडेय से बात की गई, तो उन्होंने आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उनका कहना है कि मारपीट दोनों तरफ से हुई थी, दूसरे पक्ष के जितेंद्र यादव का भी सिर फटा था।नोटिस देने के वक्त हमारी प्रधान यादव की पत्नी से बहुत अच्छे से बात हुई थी।प्रताड़ना के सारे आरोप पूरी तरह निराधार हैं। हमने तो यहाँ तक कहा था कि अगर बात सही निकली, तो केस डायरी से नाम हटा दिया जाएगा। अब सवाल यह उठता है कि अगर पुलिस इतनी ही हमदर्द थी, तो एक आम ड्राइवर को 5 पन्नों का सुसाइड नोट लिखकर अपनी जान क्यों देनी पड़ी? वहीं,परिजन और स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि वरीय पुलिस अधिकारी इस मामले की निष्पक्ष जांच कर पीड़ित परिवार को न्याय जरूर देंगे।

