नवरात्रि के तीसरे दिन माँ दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप की उपासना,”ॐ अँ अंगारकाय नमः”

नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। माँ चंद्रघंटा तंत्र साधना में मणिपुर चक्र को नियंत्रित करती हैं। मान्यता है कि शेर पर सवार माँ चंद्रघंटा की पूजा करने से भक्तों के कष्ट हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं।इन्हें पूजने से मन को शक्ति और वीरता मिलती है।ज्योतिष में इनका संबंध मंगल नामक ग्रह से होता है।

झारखण्ड न्यूज,राँची।नवरात्रि का तीसरा दिन आज है।आज होती है माँ चंद्रघंटा की पूजा।नवरात्रि का तीसरा दिन भय से मुक्ति और अपार साहस प्राप्त करने का होता है।इस दिन माँ के ‘चंद्रघंटा’ स्वरूप की उपासना की जाती है।इनके सिर पर घंटे के आकार का चन्द्रमा है।इसलिए इनको चंद्रघंटा कहा जाता है। इनके दसों हाथों में अस्त्र-शस्त्र हैं और इनकी मुद्रा युद्ध की है। माँ चंद्रघंटा तंत्र साधना में मणिपुर चक्र को नियंत्रित करती हैं।मान्यता है कि शेर पर सवार माँ चंद्रघंटा की पूजा करने से भक्तों के कष्ट हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं. इन्हें पूजने से मन को शक्ति और वीरता मिलती है। ज्योतिष में इनका संबंध मंगल नामक ग्रह से होता है।

माँ चंद्रघंटा की पूजा विधि:
माँ चंद्रघंटा की पूजा में लाल वस्त्र धारण करना श्रेष्ठ होता है. मां को लाल पुष्प, रक्त चन्दन और लाल चुनरी समर्पित करना उत्तम होता है. इनकी पूजा से मणिपुर चक्र मजबूत होता है और भय का नाश होता है. अगर इस दिन की पूजा से कुछ अद्भुत सिद्धियों जैसी अनुभूति होती है, तो उस पर ध्यान न देकर आगे साधना करते रहनी चाहिए।अगर कुंडली में मंगल कमजोर है या मंगल दोष है तो आज की पूजा विशेष परिणाम दे सकती है।पहले मां के मन्त्रों का जाप करें फिर मंगल के मूल मंत्र “ॐ अँ अंगारकाय नमः” का जाप करें।

माँ चंद्रघंटा को लगाएं ये भोग:
हर देवी के हर स्वरूप की पूजा में एक अलग प्रकार का भोग चढ़ाया जाता है।कहते हैं भोग देवी माँ के प्रति आपके समर्पण का भाव दर्शाता है।माँ चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाना चाहिए प्रसाद चढ़ाने के बाद इसे स्वयं भी ग्रहण करें और दूसरों में बांटें।देवी को ये भोग समर्पित करने से जीवन के सभी दुखों का अंत हो जाता है।

माँ चंद्रघंटा की आरती:

जय मां चंद्रघंटा सुख धाम

पूर्ण कीजो मेरे काम

चंद्र समान तू शीतल दाती

चंद्र तेज किरणों में समाती

क्रोध को शांत बनाने वाली

मीठे बोल सिखाने वाली

मन की मालक मन भाती हो

चंद्र घंटा तुम वरदाती हो

सुंदर भाव को लाने वाली

हर संकट मे बचाने वाली

हर बुधवार जो तुझे ध्याये

श्रद्धा सहित जो विनय सुनाय

मूर्ति चंद्र आकार बनाएं

सन्मुख घी की ज्योत जलाएं

शीश झुका कहे मन की बाता

पूर्ण आस करो जगदाता

कांची पुर स्थान तुम्हारा

करनाटिका में मान तुम्हारा

नाम तेरा रटू महारानी

‘भक्त’ की रक्षा करो भवानी

माँ चंद्रघंटा व्रत कथा:
पौराणिक कथा के अनुसार, दानवों के आतंक को खत्म करने के लिए माँ दुर्गा ने मां चंद्रघंटा का स्वरूप लिया था। महिषासुर नामक राक्षस ने देवराज इंद्र का सिंहासन हड़प लिया था। वह स्वर्गलोक पर राज करना चाहता था। उसकी यह इच्छा जानकार देवता बेहद ही चितिंत हो गए। देवताओं ने इस परेशानी के लिए त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश की सहायता मांगी। यह सुन त्रिदेव क्रोधिक हो गए। इस क्रोध के चलते तीनों के मुख से जो ऊर्जा उत्पन्न हुई उससे एक देवी का जन्म हुआ। भगवान शंकर ने इन्हें अपना त्रिशूल और भगवान विष्णु ने अपना चक्र प्रदान किया। फिर इसी प्रकार अन्य सभी देवी देवताओं ने भी माता को अपना-अपना अस्त्र सौंप दिया। वहीं, इंद्र ने माँ को अपना एक घंटा दिया। इसके बाद मां चंद्रघंटा महिषासुर का वध करने पहुंची। मां का यह रूप देख महिषासुर को यह आभास हुआ कि इसका काल नजदीक है। महिषासुर ने माता रानी पर हमला बोल दिया। फिर मां चंद्रघंटा ने महिषासुर का संहार कर दिया। इस प्रकार मां ने देवताओं की रक्षा की।
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