पुलिस हिरासत में मौत-रेप की न्यायिक जांच अनिवार्य,झारखण्ड हाइकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला…
राँची।झारखण्ड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने राज्य में पुलिस और न्यायिक हिरासत में होने वाली मौतों पर महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस हिरासत, जेल में मौत और रेप की हर घटना की न्यायिक जांच कराना अनिवार्य होगा।अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 196(2) का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों की जांच केवल न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही की जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिरासत में मौत और दुष्कर्म जैसे गंभीर मामलों में कार्यपालक दंडाधिकारी से कराई जाने वाली जांच पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।
अदालत ने वर्ष 2018 से अब तक के उन सभी मामलों में नए सिरे से न्यायिक जांच कराने का निर्देश दिया है, जिनमें केवल कार्यपालक दंडाधिकारी से जांच कराई गई थी। कोर्ट ने कहा कि संबंधित प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश 15 दिनों के भीतर न्यायिक मजिस्ट्रेट नामित करेंगे और छह महीने के भीतर जांच पूरी कराई जाएगी।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि वर्ष 2018 से अब तक हुई 427 हिरासत में मौत के मामलों में कानून का गंभीर उल्लंघन हुआ है। अदालत ने पाया कि 262 मामलों में न्यायिक मजिस्ट्रेट से अनिवार्य जांच कराने के बजाय कार्यपालक दंडाधिकारी से जांच कराई गई, जबकि कानून के अनुसार ऐसी जांच केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा ही की जा सकती है।अदालत ने इसे संविधान और कानून की खुली अवहेलना करार दिया। कोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये को बेहद चिंताजनक और कानून के शासन के खिलाफ बताया है। अदालत ने कहा कि कार्यपालक दंडाधिकारी की जांच न्यायिक जांच का विकल्प नहीं हो सकती।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दाखिल शपथपत्र में बताया गया कि वर्ष 2018 से 2026 तक राज्य में 427 लोगों की मौत पुलिस या न्यायिक हिरासत में हुई। इनमें 262 मामलों की जांच कार्यपालक दंडाधिकारियों और 225 मामलों की जांच न्यायिक दंडाधिकारियों से कराई गई।अदालत ने इस आंकड़े पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यह आंकड़ा आपस में मेल नहीं खाता और इससे राज्य सरकार के रिकार्ड की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा होता है।अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हिरासत में रहने वाले व्यक्ति को भी जीवन और गरिमा का अधिकार देता है। अदालत ने टिप्पणी की कि हिरासत में मौत किसी भी सभ्य लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है और राज्य की जिम्मेदारी है कि वह हिरासत में रहने वाले हर व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करे।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176(1-ए) तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 196(2) के तहत हिरासत में मौत, हिरासत से गायब होने या महिला के साथ दुष्कर्म के मामलों में न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जांच कराना अनिवार्य है। यह बाध्यकारी व्यवस्था है और इसमें किसी प्रकार की छूट नहीं दी जा सकती।अदालत ने गृह विभाग के प्रधान सचिव और सभी जिला जजों को छह महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है कि 262 मामलों में न्यायिक जांच क्यों नहीं कराई गई और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान कर उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई क्यों नहीं शुरू की जाए।
अदालत ने राज्य सरकार को 30 दिनों के भीतर सभी जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को सर्कुलर जारी करने का निर्देश दिया है कि भविष्य में हिरासत में मौत, हिरासत से गायब होने या कस्टोडियल रेप के हर मामले की सूचना 24 घंटे के भीतर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राज्य मानवाधिकार आयोग और संबंधित प्रधान जिला जज को दी जाए।अदालत ने यह भी कहा कि सूचना मिलने के 48 घंटे के भीतर न्यायिक मजिस्ट्रेट की नियुक्ति कर जांच शुरू करनी होगी। यदि जांच में हिरासत में हिंसा, लापरवाही या अस्वाभाविक मौत की पुष्टि होती है तो पीड़ित परिवार को मुआवजा देने के लिए जिला पीड़ित मुआवजा कमेटी स्वत: कार्रवाई करेगी। अदालत ने झारखंड न्यायिक अकादमी को हिरासत में मौत की जांच के लिए एक समान एसओपी और रिपोर्ट प्रारूप तैयार करने का भी निर्देश दिया है।

