गयाजी में पितृपक्ष पर आस्था का महा-सैलाब…. 51.30 लाख श्रद्धालुओं ने किया पिंडदान, टूटे पिछले सारे रिकॉर्ड
गयाजी। बिहार के मोक्षधाम गयाजी में इस वर्ष पितृपक्ष मेले ने श्रद्धा और आस्था का नया इतिहास रच दिया। अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति, पितरों की मुक्ति और मोक्ष की कामना लेकर देश के कोने-कोने से श्रद्धालु गयाजी पहुंचे। इस बार पिंडदान और तर्पण करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 51 लाख 30 हजार से अधिक दर्ज की गई। पिछले वर्ष की तुलना में करीब 16 लाख अधिक श्रद्धालुओं का पहुंचना गयाजी में धार्मिक पर्यटन के बढ़ते आकर्षण को दर्शाता है।
पितृपक्ष के दौरान देवघाट सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली। फल्गु नदी के तट से लेकर अन्य प्रमुख पिंडदान स्थलों तक धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला जारी रहा। लोगों ने विधि-विधान से पिंडदान, तर्पण और पूजा-अर्चना कर अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की। देश के विभिन्न राज्यों के अलावा रूस, फ्रांस, जर्मनी, इटली, ब्राजील और यूक्रेन समेत कई देशों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचे।
इस बार मेले की खासियत केवल श्रद्धालुओं की रिकॉर्ड संख्या ही नहीं रही, बल्कि परंपरा के साथ आधुनिक सुविधाओं का बेहतर तालमेल भी देखने को मिला। स्वास्थ्य सेवाओं, सुरक्षा व्यवस्था, स्वच्छता, ठहरने की सुविधा और तकनीक के इस्तेमाल ने श्रद्धालुओं की यात्रा को सुगम बनाने में अहम भूमिका निभाई।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी किया पिंडदान
पितृपक्ष मेले के दौरान मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने शनिवार को निरंजना नदी के तट पर पिंडदान और तर्पण कर अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा अर्पित की। उन्होंने दीप जलाकर कुलदेवी की पूजा-अर्चना भी की। मुख्यमंत्री के धार्मिक अनुष्ठान के साथ गयाजी की पौराणिक और आध्यात्मिक महत्ता एक बार फिर चर्चा में रही।
गयाजी को पितरों के श्राद्ध और पिंडदान के लिए देश के प्रमुख तीर्थस्थलों में माना जाता है। मान्यता है कि यहां विधि-विधान से पिंडदान और तर्पण करने से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी आस्था के कारण हर वर्ष पितृपक्ष में लाखों लोग अपने पूर्वजों का श्राद्ध करने पहुंचते हैं।
इस बार विदेशी श्रद्धालुओं की मौजूदगी ने भी गयाजी की अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पहचान को मजबूत किया। विदेशी तीर्थयात्रियों ने धार्मिक स्थलों की व्यवस्था, यातायात प्रबंधन, स्वच्छता और प्रशासन की ओर से उपलब्ध कराई गई सुविधाओं की सराहना की।
चार वर्षों में बढ़ती गई श्रद्धालुओं की संख्या, इस बार बना नया रिकॉर्ड
गयाजी में आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं की संख्या पिछले कुछ वर्षों से लगातार बढ़ रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 में यहां 9.40 लाख पर्यटक पहुंचे थे। वर्ष 2023 में यह संख्या बढ़कर 29.89 लाख हो गई। वर्ष 2024 में 30.59 लाख और वर्ष 2025 में 34.79 लाख पर्यटक गयाजी पहुंचे।
इस वर्ष पितृपक्ष मेले में ही 51 लाख 30 हजार से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने से पिछले वर्षों के रिकॉर्ड पीछे छूट गए। यह आंकड़ा गयाजी की धार्मिक विरासत, पिंडदान की परंपरा और तीर्थयात्रियों के बीच बढ़ते आकर्षण को दर्शाता है।
श्रद्धालुओं की संख्या में हुई इस बढ़ोतरी के साथ प्रशासन के सामने भीड़ प्रबंधन, यातायात, स्वास्थ्य सेवाओं और आवास जैसी व्यवस्थाओं को बेहतर बनाए रखने की बड़ी चुनौती थी। इसके लिए विभिन्न स्तरों पर सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं।
स्वास्थ्य सेवाओं से करीब डेढ़ लाख लोगों को मिला लाभ
पितृपक्ष मेले में लाखों श्रद्धालुओं की मौजूदगी को देखते हुए स्वास्थ्य सेवाओं पर विशेष ध्यान दिया गया। मेले के दौरान चिकित्सा और स्वास्थ्य सुविधाओं से करीब 1.5 लाख लोगों को लाभ मिला। बड़ी संख्या में बुजुर्गों और दूर-दराज से आए लोगों की मौजूदगी के कारण स्वास्थ्य सहायता को महत्वपूर्ण माना गया।
भीड़भाड़ के बीच किसी के परिजनों से बिछड़ने या किसी अन्य परेशानी में फंसने पर मदद के लिए खोया-पाया केंद्र भी सक्रिय रहा। इस केंद्र के माध्यम से 1,300 से अधिक लोगों की सहायता की गई। वहीं, श्रद्धालुओं की समस्याओं और शिकायतों के त्वरित निपटारे के लिए कंट्रोल रूम बनाया गया था। यहां करीब 2,625 शिकायतें प्राप्त हुईं, जिन पर आवश्यक कार्रवाई की गई।
इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य श्रद्धालुओं को किसी भी तरह की परेशानी से बचाना और जरूरत पड़ने पर उन्हें समय पर सहायता उपलब्ध कराना था।
टेंट सिटी में 18 हजार से अधिक श्रद्धालुओं को मिला ठिकाना
पितृपक्ष के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था भी प्रशासन के लिए अहम रही। इसके लिए बनाई गई टेंट सिटी में 18 हजार से अधिक लोगों को आश्रय मिला। इससे बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को ठहरने में सहूलियत हुई।मेले में बच्चों और बुजुर्गों के भीड़ के बीच बिछड़ने की आशंका को देखते हुए 15 हजार से अधिक रिस्ट बैंड वितरित किए गए। इनका उद्देश्य जरूरत पड़ने पर बच्चों और बुजुर्गों की पहचान करने तथा उन्हें उनके परिजनों तक पहुंचाने में मदद करना था।श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के बीच ऐसी व्यवस्थाओं को सुरक्षा और सहायता के लिहाज से उपयोगी कदम माना गया।
AI अनुवाद से विदेशी श्रद्धालुओं की राह हुई आसान
इस वर्ष पितृपक्ष मेले में आधुनिक तकनीक का भी इस्तेमाल किया गया। अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले श्रद्धालुओं और विदेशी पर्यटकों की सुविधा के लिए AI आधारित भाषा अनुवाद की व्यवस्था उपलब्ध कराई गई। इससे करीब एक लाख तीर्थयात्रियों को लाभ मिलने का दावा किया गया है।भाषा की बाधा के कारण कई बार विदेशी श्रद्धालुओं को जरूरी जानकारी हासिल करने, धार्मिक स्थलों तक पहुंचने या अपनी समस्या बताने में कठिनाई होती है। AI अनुवाद की सुविधा से संवाद आसान हुआ और श्रद्धालुओं को आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने में मदद मिली।
इस पहल ने यह भी दिखाया कि धार्मिक आयोजनों में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर व्यवस्थाओं को अधिक सुविधाजनक बनाया जा सकता है। गयाजी जैसे अंतरराष्ट्रीय धार्मिक केंद्र में इस तरह की तकनीक का उपयोग विदेशी तीर्थयात्रियों के अनुभव को बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
‘एक पेड़ पूर्वजों के नाम’ अभियान से पर्यावरण संरक्षण का संदेश
पितृपक्ष मेले में धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी जोड़ा गया। ‘एक पेड़ पूर्वजों के नाम’ पहल के तहत पितृवाटिका में 1,101 पौधे लगाए गए। इस अभियान का उद्देश्य पूर्वजों की स्मृति को प्रकृति संरक्षण से जोड़ना और लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करना था।पिंडदान और तर्पण की प्राचीन परंपरा के बीच पौधरोपण की इस पहल ने एक अलग संदेश दिया। पूर्वजों के नाम पर पौधे लगाकर उनकी स्मृति को जीवित रखने के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली बचाने की प्रेरणा भी दी गई।
आस्था, परंपरा और आधुनिक व्यवस्था का संगम बना गयाजी
इस वर्ष का पितृपक्ष मेला गयाजी के लिए कई मायनों में खास रहा। एक ओर 51.30 लाख से अधिक श्रद्धालुओं की रिकॉर्ड मौजूदगी ने धार्मिक आस्था की व्यापकता दिखाई, तो दूसरी ओर स्वास्थ्य सेवाओं, टेंट सिटी, खोया-पाया केंद्र, रिस्ट बैंड और AI अनुवाद जैसी व्यवस्थाओं ने मेले को अधिक सुविधाजनक बनाने का प्रयास किया।
विदेशी श्रद्धालुओं की भागीदारी और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी पहल ने भी इस आयोजन को नई पहचान दी। गयाजी में पितृपक्ष केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि देश की प्राचीन परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का बड़ा संगम बनकर सामने आया। इस बार की रिकॉर्ड भीड़ ने स्पष्ट किया कि पितरों के प्रति आस्था आज भी लाखों लोगों को मोक्षधाम गयाजी तक खींच लाती है।

