बैंक ऑफ इंडिया को 19.30 करोड़ की चपत: CBI ने नटराज राइस मिल्स के पूर्व निदेशकों पर कसा शिकंजा, राँची से बंगाल तक कई नामजद, केस दर्ज
-धान खरीद के नाम पर 20.43 करोड़ का कर्ज लेकर दूसरी कंपनियों में डायवर्ट किया फंड; नोटबंदी के बाद 1.01 करोड़ के पुराने नोट बैंक में जमा कराने का भी खुलासा, एनपीए होने से चार महीने पहले पूर्व निदेशकों ने दिया था इस्तीफा
राँची। सरकारी बैंक से करोड़ों रुपये का कर्ज लेकर उसका इस्तेमाल निर्धारित कारोबारी उद्देश्य के बजाय दूसरी कंपनियों में करने और वित्तीय दस्तावेजों में हेराफेरी कर बैंक को नुकसान पहुंचाने का मामला सामने आया है। बैंक ऑफ इंडिया की राँची स्थित क्लबसाइड शाखा (पूर्व में मिड कॉरपोरेट शाखा) को 19.30 करोड़ रुपये की चपत लगाने के आरोप में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने नटराज राइस मिल्स प्राइवेट लिमिटेड के पूर्व निदेशकों समेत कई लोगों और कंपनियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। सीबीआई की कोलकाता स्थित आर्थिक अपराध शाखा ने आरसी0732026ई0017 के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। जांच के दायरे में अज्ञात लोक सेवक यानी बैंक कर्मियों की भूमिका और कॉरपोरेट गारंटर कंपनियां भी हैं।
धान खरीद के नाम पर लिया 20.43 करोड़, दूसरी कंपनियों में पहुंचाया पैसा
प्राथमिकी के अनुसार, कोलकाता में पंजीकृत नटराज राइस मिल्स प्राइवेट लिमिटेड बिहार के लखीसराय स्थित डकरा में राइस मिल संचालित करती थी। कंपनी ने 2013 से 2025 के बीच बैंक ऑफ इंडिया से कुल 20.43 करोड़ रुपये की ऋण सुविधा हासिल की थी। इसमें 17 करोड़ रुपये नकद ऋण और 3.43 करोड़ रुपये कार्यशील पूंजी सावधि ऋण शामिल था। यह राशि धान खरीदने, चावल तैयार करने और उसकी थोक आपूर्ति के लिए दी गई थी। आरोप है कि कंपनी प्रबंधन ने बैंक से मिली राशि का इस्तेमाल निर्धारित काम में करने के बजाय सहयोगी और संबंधित कंपनियों के खातों में हस्तांतरित कर दिया। लंबे समय तक भुगतान नहीं होने के कारण 24 जून 2025 को कंपनी का खाता 19.30 करोड़ रुपये के बकाये के साथ गैर निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) घोषित कर दिया गया।
नोटबंदी के बाद पुराने नोटों में जमा कराए 1.01 करोड़ रुपये
मामले की फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट में नोटबंदी के दौरान कंपनी के नकद लेन-देन को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। ऑडिटर मेसर्स एनएच अग्रवाल एंड एसोसिएट्स की रिपोर्ट के अनुसार, 8 नवंबर 2016 को कंपनी के पास 1.09 करोड़ रुपये का नकद बैलेंस दर्ज था। इसमें 1.01 करोड़ रुपये पुराने 500 और 1000 रुपये के नोटों में थे। आरोप है कि इस पूरी राशि को बैंक खातों में जमा कराया गया। जांच एजेंसी इस लेन-देन के जरिए अघोषित धन को बैंकिंग प्रणाली में खपाने की आशंका की जांच कर रही है।
45 लाख का कर्ज और एडवांस बढ़कर 23.83 करोड़ पहुंचा
ऑडिट में एक और महत्वपूर्ण वित्तीय गड़बड़ी सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2016-17 में कंपनी का अल्पकालीन ऋण और अग्रिम महज 45 लाख रुपये था, जो 2022-23 तक बढ़कर 23.83 करोड़ रुपये हो गया। यह कंपनी की कुल संपत्ति के 40 प्रतिशत से अधिक था। आरोप है कि इस राशि का बड़ा हिस्सा निदेशकों और संबंधित पक्षों को हस्तांतरित किया गया। बैंक स्टेटमेंट की जांच में भगवती विंट्रेड प्राइवेट लिमिटेड जैसी कंपनियों को करोड़ों रुपये भेजने का भी पता चला है। इन लेन-देन को कंपनी की ऑडिटेड बैलेंस शीट में पूरी तरह नहीं दर्शाया गया था।

