100 रुपये की रिश्वत ने 31 साल तक नहीं छोड़ा पीछा, 75 की उम्र में अब जेल जाएंगे पूर्व रेलवे क्लर्क

 

राँची। 31 साल पहले ली गई महज 100 रुपये की रिश्वत का मामला आखिरकार झारखण्ड हाईकोर्ट तक पहुंचा और अब 75 वर्ष की उम्र में तत्कालीन रेलवे पार्सल क्लर्क को जेल जाना होगा। हटिया रेलवे स्टेशन के तत्कालीन पार्सल क्लर्क काली शंकर धोबी की रिश्वत मामले में दोषसिद्धि हाईकोर्ट ने बरकरार रखी है।

हालांकि, तीन दशक से अधिक समय तक चले मुकदमे, अधिक उम्र, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और पहली बार अपराध में दोषी पाए जाने को देखते हुए अदालत ने उनकी सजा कम कर दी।
जस्टिस प्रदीप श्रीवास्तव की अदालत ने मामले में दोषसिद्धि में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए सजा को न्यूनतम स्तर तक कम करने का आदेश दिया। अदालत ने उनकी जमानत भी रद्द कर दी है और दो महीने के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। निर्धारित अवधि में आत्मसमर्पण नहीं करने पर उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई हो सकती है।

मोटरसाइकिल बुक कराने के लिए मांगी थी 100 रुपये की रिश्वत

मामला 27 अप्रैल 1995 का है। उस समय काली शंकर धोबी हटिया रेलवे स्टेशन पर पार्सल क्लर्क के पद पर तैनात थे। एक व्यक्ति अपनी मोटरसाइकिल को समस्तीपुर भेजने के लिए रेलवे पार्सल में बुक कराने पहुंचा था। मोटरसाइकिल की बुकिंग के लिए निर्धारित रेलवे शुल्क 203 रुपये था।आरोप था कि पार्सल बुक करने के एवज में काली शंकर ने व्यक्ति से 100 रुपये रिश्वत की मांग की। शिकायत मिलने के बाद सीबीआई ने कार्रवाई की योजना बनाई। आरोप के मुताबिक, जाल बिछाकर काली शंकर को रिश्वत की रकम लेते हुए पकड़ लिया गया। इसके बाद उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत मामला दर्ज किया गया।

नौ साल बाद आया ट्रायल कोर्ट का फैसला
सीबीआई की कार्रवाई के बाद मामला अदालत पहुंचा, लेकिन मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में करीब नौ साल लग गए। वर्ष 2004 में ट्रायल कोर्ट ने काली शंकर को दोषी करार दिया।
अदालत ने भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा-7 के तहत एक साल के कठोर कारावास और धारा 13(2) के तहत डेढ़ साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। दोनों सजाएं साथ-साथ चलनी थीं। इसके बाद काली शंकर ने निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

अपील भी दो दशक से ज्यादा समय तक रही लंबित
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। दोषसिद्धि के खिलाफ दाखिल अपील हाईकोर्ट में भी दो दशक से अधिक समय तक लंबित रही। इस दौरान काली शंकर की उम्र बढ़ती गई और वह सरकारी नौकरी भी गंवा चुके थे। अब उनकी उम्र 75 वर्ष से अधिक हो चुकी है।
बचाव पक्ष की ओर से अदालत को बताया गया कि काली शंकर उम्र संबंधी कई बीमारियों से जूझ रहे हैं और यह उनका पहला अपराध है। साथ ही 1995 में हुई घटना के बाद से वह करीब तीन दशक से अधिक समय से कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं।

हाईकोर्ट ने कहा- दोषसिद्धि में दखल का आधार नहीं
अदालत ने परिस्थितियों पर विचार करते हुए माना कि दोषसिद्धि को समाप्त करने का आधार नहीं बनता। हालांकि, मुकदमे की असाधारण रूप से लंबी अवधि, आरोपी की अधिक उम्र, स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां, पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं होना और नौकरी गंवा देना सजा के स्तर पर विचार करने योग्य परिस्थितियां हैं।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने सजा में कमी कर दी।

2.5 साल की कुल सजा घटाकर अब डेढ़ साल
हाईकोर्ट ने धारा-7 के तहत दी गई एक साल की कठोर कैद को छह महीने के साधारण कारावास में बदल दिया है। वहीं धारा 13(2) के तहत डेढ़ साल की कठोर कैद को घटाकर एक साल के साधारण कारावास में कर दिया गया है।दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी। निचली अदालत में जमा कराया गया जुर्माना बरकरार रखा गया है।इस तरह 1995 में महज 100 रुपये की रिश्वत से शुरू हुआ मामला, करीब 31 साल बाद 75 वर्षीय पूर्व रेलवे कर्मचारी के लिए फिर जेल जाने की नौबत पर पहुंच गया है।

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