झारखण्ड में नौकरियों की मंडी: हरिओम टॉवर से लखनऊ-पंजाब तक, बाहर से बुलाए गए मुन्नाभाई और लेखक जानिए ऐसे रची गई थी सबसे बड़ी नौकरी लूट की साजिश

राँची।झारखण्ड में सरकारी नौकरियों की उम्मीद पालने वाले लाखों युवाओं के सपनों का खून कैसे किया जाता है, इसका एक ऐसा खौफनाक और सनसनीखेज सच सामने आया है जो सिस्टम की जड़ों को हिलाकर रख देगा।जेपीएससी और जेएसएससी की परीक्षाओं में पारदर्शिता के नाम पर सिर्फ फरेब का जाल बुना गया। यहां योग्यता की कसौटी पर भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी और डिजिटल मैनिपुलेशन हावी था।करोड़ों रुपए की डील, ओएमआर शीट में सुनियोजित छेड़छाड़, ऑन-स्क्रीन मार्किंग में फर्जीवाड़े और परीक्षा नियंत्रक से लेकर कोचिंग संचालकों की साठगांठ ने यह साबित कर दिया है कि झारखण्ड में सरकारी कुर्सी अब मेहनत से नहीं, बल्कि बोली लगाकर खरीदी जा रही थी।
जेपीएससी और टीडीपीएल की साठगांठ: कमीशन तय, सीटें नीलाम
भ्रष्टाचार की इस पूरी पटकथा की शुरुआत होती है टीडीपीएल कंपनी और जेपीएससी के तत्कालीन शीर्ष अधिकारियों के बीच हुई गुप्त बैठकों से। जांच में यह बात खुलकर सामने आई है कि टीडीपीएल को परीक्षा संचालन और तकनीकी कामकाज का जिम्मा सौंपने से पहले ही रेट तय कर लिए गए थे। 2 करोड़ की डील और 20% अतिरिक्त कमीशन भी। कंपनी को काम सौंपने की एवज में भारी-भरकम घूस तय की गई थी, जिसके बाद सीटों की खरीद-फरोख्त का रास्ता पूरी तरह साफ कर दिया गया। उस्मान और प्रदीप कुमार सिंह जैसे तकनीकी स्टाफ इस खेल के अहम मोहरे थे। प्रदीप की निगरानी में ओएमआर प्रोसेसिंग और रिजल्ट पब्लिकेशन का काम होता था, जबकि उस्मान सुपरविजन संभालता था। इसके बदले उस्मान को कुल बिल का 20 प्रतिशत हिस्सा देने का लालच दिया गया था।
कहां से जुड़े तार और कैसे रटवाए गए उत्तर
सिर्फ जेपीएससी ही नहीं, बल्कि जेएसएससी की कंबाइंड ग्रेजुएट लेवल परीक्षा भी इस काली करतूत से अछूती नहीं रही।सीजेएल परीक्षा का पेपर लीक होना इस बात का प्रमाण था कि परीक्षा संस्थाओं के भीतर बैठे लोग ही सेंधमारी करवा रहे थे।प्रश्न पत्र कहां से बाहर आए, छात्रों को परीक्षा से पहले किन सुरक्षित ठिकानों पर रखा गया और कैसे उन्हें प्रश्न-उत्तर रटवाए गए—इन तमाम सवालों के जवाब इस बात की गवाही देते हैं कि पूरी चयन प्रक्रिया बिचौलियों के हाथों गिरवी रख दी गई थी। इसके बदले उम्मीदवारों से मुंहमांगी रकम वसूली गई थी।
पावर सेंटर और सिंडिकेट का नेक्सेस
इस रैकेट का दायरा सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें आयोग के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग और नामी कोचिंग संचालक शामिल थे।जेपीएससी अध्यक्ष एल. ख्यांगते के अलावा सदस्य अजीता भट्टाचार्य, जमाल अहमद, अनीमा हांसदा और पतंजलि कोचिंग के रवि कुमार मिलकर इस पूरे खेल को अंजाम देते थे। 11वीं से 13वीं जेपीएससी परीक्षाओं में अभय तिवारी, टीडीपीएल निदेशक रामवीर सिंह और अन्य ने मिलकर अभ्यर्थियों से पैसे वसूले और आपस में बांटे।जिस भी उम्मीदवार से जो अधिकारी पैसे तय करता था, उसे अपने साक्षात्कार (इंटरव्यू) बोर्ड में शामिल कर मनमाने तरीके से बंपर नंबर देकर पास करा दिया जाता था।
डिजिटल फरेब के तीन हथियार
यह एक ऐसी ऑनलाइन व्यवस्था है जिसके तहत उम्मीदवार अपनी बुनियादी जानकारी पोर्टल पर एक बार दर्ज करते हैं, जिससे बार-बार फॉर्म भरने पर विवरण ऑटो-फिल हो जाता है. लेकिन इसी सिस्टम की आड़ में डेटा तक अवैध पहुंच बनाई गई. बहुविकल्पीय प्रश्नों के उत्तरार्कन के लिए इस्तेमाल होने वाली इस कागजी उत्तर पुस्तिका में प्रदीप कुमार सिंह और उसकी टीम सीधे तौर पर छेड़छाड़ करती थी। खाली छोड़े गए गोलों को बाद में सही उत्तरों से भर दिया जाता था।उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन कर डिजिटल पोर्टल पर जांचने की इस तकनीक में हेमंत कुमार वर्मा और संजय कुमार सेंध लगाते थे। वे कॉपियों के अंकों में फेरबदल कर अयोग्य उम्मीदवारों को पास कराते थे।
दलालों के जरिए तय हुईं सफलता की इबारतें
सफल उम्मीदवारों की लिस्ट: एसीएफ , एफआरओ, 14वीं जेपीएससी और बैकलॉग परीक्षाओं में सैकड़ों अभ्यर्थी पैसे देकर पास हुए हैं. एसीएफ और एफआरओ की प्रारंभिक परीक्षा के आंसर-की मूल्यांकन से पहले ही व्हाट्सएप के जरिए टीडीपीएल कर्मचारियों को लीक कर दिए गए थे। रामवीर सिंह ने हजारीबाग के अजीत यादव, राँची की नीतू कुमारी, दीपशिखा कुमारी, पलामू के संतोष राम, चतरा के संजीत कुमार यादव समेत कई अन्य अभ्यर्थियों के ओएमआर शीट में स्ट्रॉंग रूम से निकालकर खाली प्रश्नों के सही गोले भरवाए और उनके मार्क्स बढ़ाए. अभय तिवारी, धर्मेंद्र, आनंद और रवि ने एफआरओ के 15 और एसीएफ-एफआरओ के कुल 40-50 उम्मीदवारों के रोल नंबर दिए थे. प्रति कैंडिडेट 8 से 10 लाख रुपए तय किए गए थे। इस एवज में अभय तिवारी ने रामवीर सिंह को 1 करोड़ 10 लाख रुपए नकद विभिन्न किश्तों में दिए थे।
बाहर से बुलाए गए मुन्नाभाई और लेखक
भ्रष्टाचार की इस चेन में रांची के हरिओम टॉवर का फ्लैट एक प्रमुख अड्डा बन चुका था। सीडीपीओ (CDPO) और अन्य परीक्षाओं में मेंस के उत्तर लिखवाने के लिए एजेंट सतपाल और मिश्रा लखनऊ, पंजाब तथा हरियाणा से लोग बुलाते थे. हरिओम टॉवर स्थित सानंद प्रकाश उर्फ आनंद के फ्लैट पर दूसरे राज्यों के होनहारों से कॉपियां लिखवाई जाती थीं।जिन अभ्यर्थियों के उत्तर ठीक-ठाक होते थे, उनके नंबर बढ़ाने के लिए विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों से संपर्क साधा जाता था।सीडीपीओ परीक्षा में लगभग सभी जनरल सीटों पर झारखण्ड से बाहर के अभ्यर्थियों के चुने जाने के पीछे यही सिंडिकेट सक्रिय था। टीडीपीएल के रामवीर और सतपाल सिंह के संबंध रसूखदार लोगों तक थे। रामवीर ने यहां तक खुलासा किया कि उसने आईएएस अधिकारी मनीष रंजन के घर आने-जाने के दौरान सुना था कि उनके भी तीन अभ्यर्थियों की सेटिंग 14वीं जेपीएससी में करवाई गई थी।

