कोल्हान-सारंडा का लाल किला ढहा, 28 दिनों में शीर्ष चेहरों का खात्मा और ऑपरेशन नवजीवन-II से टूटी माओवाद की अंतिम रीढ़–

–सरेंडर करने वाले ये 14 नक्सली पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा उर्फ सागर जी और केंद्रीय कमेटी सदस्य असीम मंडल की उस मारक टीम के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार है
राँची।झारखण्ड के सुदूर जंगलों में दशकों से समानांतर सत्ता चलाने वाले भाकपा (माओवादी) संगठन का अंत अब औपचारिकता मात्र रह गया है। ऑपरेशन नवजीवन-II के तहत 16 कुख्यात नक्सलियों द्वारा 11 अत्याधुनिक हथियारों और 1562 गोलियों के साथ किया जाना आत्मसमर्पण महज एक नियमित पुलिस इवेंट नहीं है, बल्कि यह कोल्हान और सारंडा के अभेद्य माने जाने वाले नक्सली किले के पूरी तरह ढहने की आधिकारिक पटकथा है। सबसे गौर करने वाली बात यह है कि सरेंडर करने वाले ये 14 नक्सली पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा उर्फ सागर जी और केंद्रीय कमेटी सदस्य असीम मंडल की उस मारक टीम के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार है, जिन्हें चाईबासा, कोल्हान और सारंडा के चप्पे-चप्पे की भौगोलिक जानकारी थी। मिसिर बेसरा के सबसे मजबूत सुरक्षा कवच और ””ह्यूमन शील्ड”” कहे जाने वाले इस दस्ते के हथियार डालते ही अब माओवादी शीर्ष नेतृत्व जंगलों में पूरी तरह से अकेला, अलग-थलग और बेबस पड़ गया है।
सुरक्षा बलों के ””ट्रिपल स्ट्राइक”” गिरफ्तारी, मुठभेड़ और सरेंडर ने संगठन को किया खोखला
झारखण्ड में माओवाद के खात्मे की यह पटकथा केवल एक दिन में नहीं लिखी गई, बल्कि पिछले दो महीनों में सुरक्षा बलों के ””ट्रिपल स्ट्राइक”” (गिरफ्तारी, मुठभेड़ और सरेंडर) ने संगठन के समूचे ढांचे को भीतर से खोखला कर दिया है। सरकारी आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण करें तो मई 2026 से लेकर अब तक का समय झारखण्ड पुलिस के इतिहास का सबसे सफल नक्सल विरोधी काल साबित हुआ है। 21 मई 2026 को 27 बड़े नक्सल कमांडरों के सामूहिक सरेंडर के बाद माओवादियों को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब 13 जुलाई को 20 लाख का इनामी शीर्ष कमांडर रवींद्र गंझू दबोचा गया और ठीक चार दिन बाद 17 जुलाई को 25 लाख का इनामी स्पेशल एरिया कमेटी सदस्य (सैक) अजय महतो उर्फ टाइगर पुलिस की गिरफ्त में आया। इसके तुरंत बाद महिला कमांडर बबिता उर्फ अनीता किस्कू के सरेंडर और अकेले वर्ष 2026 में अब तक 93 नक्सलियों की गिरफ्तारी, 45 के सरेंडर और मुठभेड़ में 22 के मारे जाने के आंकड़ों ने यह साफ कर दिया है कि राज्य में माओवादी विचार और नेटवर्क दोनों अपनी अंतिम सांसें ले रहे हैं।
आत्मसमर्पण की सबसे महत्वपूर्ण परत इसका अंतरराज्यीय फैलाव इंटेर-स्टेट रिपल इफेक्ट
इस आत्मसमर्पण की सबसे अलग और महत्वपूर्ण परत इसका अंतरराज्यीय फैलाव (इंटेर-स्टेट रिपल इफेक्ट) है। सुरक्षा बलों के बढ़ते चौतरफा दबाव और संगठन के भीतर पनपे आंतरिक शोषण से त्रस्त होकर इसी दस्ते के 8 अन्य नक्सली कमांडर (जिनमें 5 महिला नक्सली शामिल हैं) छत्तीसगढ़ में भी पुलिस के सामने घुटने टेक चुके हैं। पश्चिमी सिंहभूम, लातेहार, लोहरदगा, गिरिडीह, बोकारो और ओडिशा के सुंदरगढ़ से ताल्लुक रखने वाले इन 16 माओवादियों (11 पुरुष व 5 महिला) में 15 लाख का इनामी रीजनल कमेटी मेंबर संतोष महतो (128 कांडों का आरोपी), 3 जोनल और 3 सब-जोनल कमांडर शामिल हैं।
झारखण्ड पुलिस, सीआरपीएफ, कोबरा और झारखण्ड जगुआर के इस एकीकृत और रणनीति-आधारित प्रहार ने न केवल माओवादियों का हथियारों का जखीरा छीन लिया है, बल्कि यह संदेश भी दे दिया है कि सरकार की ””आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति”” के सामने अब हिंसा का रास्ता चुनने वालों के पास या तो जेल का रास्ता बचा है या फिर मुख्यधारा में लौटकर आत्मसमर्पण करने का विकल्प।

