उजड़ा आशियाना, भीगी किताबें और टूटते सपने;राँची की बेटी की दर्दभरी कहानी

 

राँची। राजधानी राँची में नगर निगम की एक कार्रवाई ने एक गरीब परिवार की पूरी दुनिया पलभर में उजाड़ दी। यह सिर्फ एक मकान या दुकान टूटने की घटना नहीं है, बल्कि एक होनहार छात्रा के सपनों, एक मां की उम्मीदों और पूरे परिवार के भविष्य पर गिरी ऐसी चोट है, जिसकी भरपाई शायद आसान नहीं होगी।

उर्सलाइन स्कूल की दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली लक्ष्मी मुंडा की सुबह बिल्कुल सामान्य थी। रोज़ की तरह वह अपनी किताबें लेकर स्कूल गई थी। घर से निकलते समय उसे क्या पता था कि जिस घर से वह पढ़ने निकली है, शाम तक वह घर सिर्फ याद बनकर रह जाएगा।दोपहर में स्कूल से लौटते ही लक्ष्मी के कदम वहीं थम गए। उसकी आंखों के सामने जो दृश्य था, उसने उसकी दुनिया बदल दी। जिस जगह सुबह तक उसका छोटा-सा घर और परिवार की रोज़ी-रोटी का सहारा बनी दुकान खड़ी थी, वहां अब सिर्फ ईंट, पत्थर, टीन और टूटी हुई लकड़ियों का मलबा बिखरा पड़ा था। नगर निगम की टीम कार्रवाई कर चुकी थी और परिवार के पास अब सिर छिपाने के लिए कोई छत नहीं बची थी।

इसी बीच लगातार हो रही बारिश ने इस परिवार की मुश्किलों को और बढ़ा दिया। खुले आसमान के नीचे खड़ा परिवार अपने टूटे हुए सामान को बचाने की कोशिश करता रहा। लक्ष्मी की किताबें, कॉपियां और स्कूल का सामान बारिश में भीगते रहे। वह एक-एक किताब को मलबे के बीच से निकालकर समेट रही थी। उन भीगे हुए पन्नों के साथ उसके भविष्य के सपने भी मानो पानी में बहते दिखाई दे रहे थे।

लक्ष्मी बचपन से वैज्ञानिक बनने का सपना देखती है। पढ़ाई में अच्छी होने के कारण उसके शिक्षक भी उसकी मेहनत की सराहना करते रहे हैं। लेकिन आज उसके सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सिर पर छत ही नहीं रहेगी, तो पढ़ाई कैसे होगी? किताबें कहां रखेंगी? स्कूल की तैयारी कैसे करेगी? क्या उसका सपना अब सिर्फ सपना बनकर रह जाएगा?

दूसरी ओर, उसकी मां सरिता मुंडा गहरे सदमे में हैं। परिवार के लोग बताते हैं कि घटना के बाद वह कई बार बेहोश हो चुकी हैं। आंखों में आंसू और चेहरे पर बेबसी लिए सरिता कहती हैं,
“मेरी मां भी मोरहाबादी के रजिस्ट्री ऑफिस के सामने इसी जगह रहती थीं। मेरी बेटी लक्ष्मी का जन्म भी यहीं हुआ। यही हमारा घर था, यही हमारी दुनिया थी। हमने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन सब कुछ यूं खत्म हो जाएगा। बिना किसी नोटिस के हमारा घर और दुकान तोड़ दिया गया। अब हम कहां जाएं?”

सरिता बताती हैं कि परिवार के पास रहने के लिए कोई दूसरी जमीन या मकान नहीं है। दुकान से होने वाली मामूली आमदनी ही पूरे परिवार के गुज़ारे का एकमात्र सहारा थी। अब दुकान भी नहीं रही और सिर पर छत भी नहीं बची। ऐसे में सबसे बड़ा संकट यह है कि आज की रात परिवार कहां बिताएगा? बच्चों को बारिश से कैसे बचाया जाएगा? खाने-पीने की व्यवस्था कैसे होगी? और आने वाले दिनों में जीवन कैसे चलेगा?

मलबे के बीच बैठी लक्ष्मी अपनी भीगी हुई किताबों को सीने से लगाए कभी अपने टूटे घर को देखती है तो कभी अपनी मां को। उसकी आंखों में आंसू हैं, लेकिन उन आंसुओं में अपने भविष्य की चिंता साफ दिखाई देती है। आसपास खड़े लोग भी इस दृश्य को देखकर भावुक हो उठे। किसी के पास सांत्वना के शब्द थे, तो कोई प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठा रहा था।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि अतिक्रमण हटाना जरूरी भी था, तो मानवीय संवेदनाओं का ध्यान रखा जाना चाहिए था। परिवार को पर्याप्त समय, वैकल्पिक व्यवस्था या पुनर्वास का अवसर दिया जा सकता था। बारिश के मौसम में इस तरह किसी परिवार को बेघर कर देना कई सवाल खड़े करता है।

यह घटना अब सिर्फ एक मकान टूटने की खबर नहीं रह गई है। यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जिसमें विकास और कानून के नाम पर कभी-कभी सबसे कमजोर लोगों की जिंदगी सबसे ज्यादा प्रभावित होती है। यह उस बेटी की कहानी है, जो वैज्ञानिक बनने का सपना देख रही थी, लेकिन आज अपनी भीगी किताबों और उजड़े आशियाने के बीच अपने भविष्य को तलाश रही है।

अब निगाहें सरकार, नगर निगम और समाज की ओर हैं। क्या इस परिवार को रहने के लिए छत मिलेगी? क्या लक्ष्मी की पढ़ाई दोबारा पटरी पर लौट पाएगी? क्या उसके सपनों को फिर से उड़ान मिलेगी? इन सवालों का जवाब आने वाला समय देगा। फिलहाल, बारिश में भीगता यह परिवार मदद की आस लगाए खड़ा है।

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