JPSC परीक्षा में बड़ा खेल, सेंटर से बाहर घर में लिखी गईं कॉपियां, CID चार्जशीट में कई सनसनीखेज खुलासे…

 

राँची।झारखण्ड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की परीक्षाओं में धांधली, ओएमआर शीट टेंपरिंग और मेधा घोटाले की जांच कर रही अपराध अनुसंधान विभाग (सीआईडी) ने अदालत में विस्तृत चार्जशीट दाखिल कर दी है। चार्जशीट में दर्ज खुलासे बताते हैं कि आयोग के भीतर परीक्षा संचालन से लेकर इंटरव्यू और मेरिट लिस्ट तैयार करने तक, हर स्तर पर भ्रष्टाचार का एक संगठित रैकेट काम कर रहा था। पूर्व अध्यक्ष एल. खियांग्ते के गोपनीय दफ्तर से बरामद दस्तावेज, कंप्यूटर ऑपरेटर के करोड़ों के निवेश, निजी सहायकों के बैंक खातों में बेहिसाब लेनदेन और परीक्षा केंद्र के बाहर कॉपियां लिखने का खेल अब आधिकारिक जांच में प्रमाणित हो चुका है।

पूर्व अध्यक्ष के गोपनीय कार्यालय की अलमारी से मिले 8 एडमिट कार्ड

सीआईडी ने 9 अगस्त 2026 को जेपीएससी के पूर्व अध्यक्ष एल. खियांग्ते के गोपनीय कार्यालय में छापेमारी की थी। जांच अधिकारियों ने जब वहां रखी एक अलमारी की तलाशी ली, तो उसमें फॉरेस्ट रेंज अफसर परीक्षा के 8 अभ्यर्थियों के एडमिट कार्ड सुरक्षित रखे मिले। एडमिट कार्ड वाले अभ्यर्थी बचनदेव कुमार वर्मा, रंजन कुमार, आशीष कुमार, धनेश्वर प्रसाद वर्मा, रूबी कुमारी, शशिकांत, आलोक रंजन कुमार और विकास कुमार है। संवैधानिक पद पर बैठे अध्यक्ष के निजी कक्ष में परीक्षा से जुड़े अभ्यर्थियों के प्रवेश पत्र मिलना सीधे तौर पर व्यक्तिगत दखल और धांधली की पुष्टि करता है।

कंप्यूटर ऑपरेटर धर्मेंद्र: 2 साल में चेयरमैन से 267 बार बात, महीने का 1 लाख ब्याज

एल. खियांग्ते का कंप्यूटर ऑपरेटर धर्मेंद्र कुमार केवल डेटा एंट्री तक सीमित नहीं था, बल्कि वह उनके गोपनीय कार्यालय में कार्यालय प्रधान की हैसियत से काम कर रहा था। फरवरी 2025 में एल. खियांग्ते के अध्यक्ष बनने के बाद धर्मेंद्र पूरी तरह सक्रिय बिचौलिया बन गया। उसने दागी एजेंसियों और दलालों के बीच सेतु का काम किया। धर्मेंद्र के पास से लैपटॉप, पेनड्राइव और बिहार के अरवल जिले में खरीदी गई बेनामी जमीनों के डीड मिले हैं। उसने एक निजी क्लब में 10 लाख रुपए की अवैध रकम निवेश की थी, जिसके बदले उसे हर महीने 1 लाख रुपए का ब्याज मिलता था। दो साल में खियांग्ते और धर्मेंद्र के बीच 267 बार फोन पर बात हुई। गिरफ्तारी के वक्त धर्मेंद्र ने साक्ष्य मिटाने के लिए अपना मोबाइल जमीन पर पटक कर तोड़ दिया था।

एफआरओ का रेट 40 लाख, एसीएफ के लिए 50 लाख में सौदा

सीआईडी की जांच में अभ्यर्थियों को पास कराने के तय रेट और लेन-देन का ब्योरा सामने आया है। कोचिंग शिक्षक रविशंकर के मार्फत धर्मेंद्र को 8 अभ्यर्थियों के रोल नंबर मिले। प्रति अभ्यर्थी 40 लाख रुपए में सौदा हुआ। सात अभ्यर्थियों को पास कराने के लिए प्रति अभ्यर्थी 50 लाख रुपए की दर तय की गई। ये सभी 15 रोल नंबर परीक्षा संचालन एजेंसी ‘मेसर्स टीएसआर डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड’ (टीडीपीएल) के निदेशक सतपाल सिंह को दिए गए थे। परिणाम आने पर ये सभी 15 अभ्यर्थी सफल घोषित हुए। इस प्रारंभिक परीक्षा में भी ओएमआर शीट में स्कैनिंग और कोडिंग के स्तर पर छेड़छाड़ कर अयोग्य अभ्यर्थियों को पास कराया गया।

परीक्षा केंद्र से बाहर राँची के रातू में लिखी गईं मेंस की कॉपियां

घोटाले की सबसे चौंकाने वाली कार्यप्रणाली मुख्य परीक्षा में सामने आई। ‘शिवांगन की पाठशाला’ कोचिंग संस्थान के निदेशक संजीत कुमार ने आयोग और एजेंसी के सिंडिकेट से सांठगांठ की। एफआरओ मुख्य परीक्षा के दौरान 6 अभ्यर्थियों की कॉपियां परीक्षा केंद्र से बाहर निकाल ली गईं।राँची के रातू स्थित एक निजी मकान में इन कॉपियों को परीक्षार्थियों और बाहरी लोगों से अलग से लिखवाया गया और बाद में उन्हें सुरक्षित तरीके से मूल बंडलों में जमा करवा दिया गया।

सदस्य अजिता भट्टाचार्य का पीए ब्रज कुमार: इंटरव्यू में 80 अंक का खेल

जेपीएससी की तत्कालीन सदस्य अजिता भट्टाचार्य के निजी सहायक ब्रज कुमार राम का एक स्वतंत्र सिंडिकेट आयोग के भीतर चल रहा था। ब्रज कुमार राम 2012 में आयोग में पीए बना था और 2 सितंबर 2021 को सदस्य अजिता भट्टाचार्य का पीए नियुक्त हुआ। उसकी पहुंच आयोग के इंटरव्यू बोर्ड तक थी। जांच में पाया गया कि कई अभ्यर्थियों की सेटिंग सीधे अजिता भट्टाचार्य के जरिए करवाई गई थी। कोचिंग संचालक आदित्य पांडेय के जरिए ब्रज कुमार को मनीष कुमार नामक अभ्यर्थी को पास कराने का जिम्मा मिला। ब्रज कुमार ने इंटरव्यू बोर्ड में प्रभाव डालकर मनीष को 80 अंक दिलवाए। इसके बदले उसे 5 लाख रुपए मिले। इसके अलावा आदित्य पांडेय ने चार अन्य अभ्यर्थियों के क्रमांक भी 20 लाख रुपए प्रति अभ्यर्थी की डील पर ब्रज कुमार को सौंपे थे।

वेतन 31 लाख, खाते में सवा करोड़: 1771 बार हुआ संदिग्ध ट्रांजेक्शन

सीआईडी ने वित्तीय जांच में पाया कि ब्रज कुमार राम के तीन बैंक खाते पूरी तरह भ्रष्टाचार की रकम खपाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे थे। 1 जनवरी 2024 से 2 अक्टूबर 2026 के बीच कुल 1771 बार वित्तीय लेनदेन किए गए, जिसमें करीब 1.05 करोड़ रुपए का प्रवाह दिखा। इस दौरान उसका सरकारी वेतन केवल 31.33 लाख रुपए था। बाकी की भारी रकम विभिन्न परीक्षाओं के आयोजन और रिजल्ट के समय खातों में आई। सीआईडी ने पाया कि इस गिरोह ने हवाला के जरिए करोड़ों रुपए ट्रांसफर किए और अवैध कमाई को दिल्ली, राँची तथा धनबाद के प्रॉपर्टी मार्केट में खपाया।

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