आधी रात को थम गई थी देश की 86.9% नकदी.. नोटबंदी के 10 साल, 15.41 लाख करोड़ के पुराने नोटों में से 99.3% लौट आए थे बैंक
राँची।रात के ठीक 8 बजे टीवी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए और एक ऐसी घोषणा की, जिसने देखते ही देखते पूरे देश की अर्थव्यवस्था का पहिया बदल दिया। तारीख थी 8 नवंबर 2016. ऐलान हुआ कि आधी रात से प्रचलन में मौजूद 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट कानूनी मुद्रा नहीं रहेंगे। इसके साथ ही देश में नकदी का सबसे बड़ा हिस्सा एक झटके में अमान्य हो गया। बैंकों के बाहर लंबी कतारें लग गईं, एटीएम खाली होने लगे और बाजार से लेकर घरों तक नकदी की किल्लत महसूस होने लगी। आज इस ऐतिहासिक फैसले के 10 साल पूरे हो गए हैं, लेकिन नोटबंदी के फायदे, नुकसान और इसके वास्तविक नतीजों पर बहस अब भी जारी है।
एक घोषणा और देश की 86.9 फीसदी नकदी अमान्य
नोटबंदी के समय बाजार में प्रचलित 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों का कुल मूल्य करीब 15.4 लाख करोड़ रुपये था। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, यह उस समय देश में प्रचलित कुल मुद्रा मूल्य का लगभग 86.9 प्रतिशत था।सरकार ने इस बड़े फैसले के पीछे काले धन पर चोट, नकली नोटों पर रोक, भ्रष्टाचार पर अंकुश और आतंकवाद की फंडिंग को कमजोर करने जैसे उद्देश्य बताए थे। इसके साथ ही डिजिटल भुगतान और अर्थव्यवस्था को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने पर जोर दिया गया।
सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा: 99.3 फीसदी नोट लौट आए!
नोटबंदी के बाद सबसे बड़ा सवाल यही था कि आखिर बंद किए गए कितने नोट वापस बैंकिंग सिस्टम में आए? RBI की 2017-18 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, नोटबंदी के समय प्रचलन में मौजूद करीब 15.41 लाख करोड़ रुपये के पुराने नोटों में से 15.31 लाख करोड़ रुपये वापस आ गए। यानी लगभग 99.3 फीसदी बंद नोट बैंकिंग सिस्टम में लौट आए।इस आंकड़े ने नोटबंदी के घोषित उद्देश्यों और उसके परिणामों को लेकर नई बहस छेड़ दी। हालांकि, नोटों का वापस आना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि काले धन, नकली मुद्रा और आतंकवाद की फंडिंग पर कार्रवाई कितनी सफल रही।
बैंक और ATM के बाहर लगी थी कतारें, कारोबार तक हुआ प्रभावित
नोटबंदी की घोषणा के बाद देशभर में आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। पुराने नोट जमा कराने और नई मुद्रा निकालने के लिए बैंकों के बाहर सुबह से शाम तक लंबी कतारें लगी रहती थीं। एटीएम में नकदी की कमी थी और निकासी की सीमाएं तय कर दी गई थीं।
इसका सबसे ज्यादा दबाव नकदी पर निर्भर कारोबार पर पड़ा। छोटे दुकानदारों, किसानों, मजदूरों और रोजाना कमाई करने वाले लोगों के सामने आर्थिक चुनौतियां खड़ी हो गईं। शादी-विवाह, इलाज और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए नकदी जुटाना भी मुश्किल हो गया था।
डिजिटल भुगतान को मिला बढ़ावा, लेकिन UPI की कहानी भी अलग
नोटबंदी के बाद मोबाइल वॉलेट, कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग और ऑनलाइन ट्रांजैक्शन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा। लोगों ने नकदी के विकल्प तलाशने शुरू किए। डिजिटल भुगतान को लेकर जागरूकता भी बढ़ी।हालांकि, डिजिटल क्रांति का पूरा श्रेय केवल नोटबंदी को देना सही नहीं होगा। स्मार्टफोन, इंटरनेट की पहुंच, बैंकिंग सेवाओं के विस्तार और UPI जैसे भुगतान माध्यमों ने भी डिजिटल लेनदेन को नई ऊंचाई तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।
10 साल बाद भी घर में रखे पुराने नोट किसी काम के नहीं!
नोटबंदी के एक दशक बाद भी कई लोगों के घरों में पुराने 500 और 1000 रुपये के नोट रखे होने की संभावना है। ऐसे लोगों के लिए सबसे बड़ा सवाल है कि क्या अब इन नोटों को बैंक में जमा या एक्सचेंज कराया जा सकता है?
इसका सीधा जवाब है- सामान्य बैंक शाखाओं में अब इन नोटों को जमा कराने या बदलने की सुविधा नहीं है। पुराने 500 और 1000 रुपये के नोट वैध मुद्रा नहीं हैं। इनके संबंध में विशेष कानूनी प्रावधान लागू हैं। इसलिए घर में रखे पुराने नोटों को सामान्य भुगतान या खरीदारी में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
झारखण्ड के हाट-बाजार से शहरों तक महसूस हुई थी नकदी की किल्लत
नोटबंदी का असर झारखण्ड में भी व्यापक रूप से महसूस किया गया था। राँची, जमशेदपुर, धनबाद और बोकारो जैसे शहरी इलाकों के साथ पलामू, गढ़वा, लातेहार, गुमला, सिमडेगा और संताल परगना के ग्रामीण बाजारों में भी नकदी की उपलब्धता बड़ी चुनौती बन गई थी।खेती-किसानी, मजदूरी, छोटे व्यापार और साप्ताहिक हाट-बाजारों में नकदी की अहम भूमिका थी। पुराने नोट बंद होने के बाद ग्रामीणों को बैंक खातों में रकम जमा कराने और जरूरत के मुताबिक पैसे निकालने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी। छोटे दुकानदारों और कारोबारियों को भी लेनदेन में परेशानी हुई।
10 साल बाद भी सवाल वही: कितना बदला देश का आर्थिक चेहरा?
8 नवंबर 2016 की रात लिया गया फैसला भारतीय आर्थिक इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में शामिल हो चुका है। एक तरफ सरकार इसे काले धन, नकली मुद्रा और आतंकवाद के खिलाफ बड़ा कदम बताती रही, तो दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था, रोजगार, छोटे कारोबार और नोटों की वापसी के आंकड़ों को लेकर सवाल उठते रहे।
दस साल बाद भी नोटबंदी की कहानी केवल पुराने नोटों के बंद होने की कहानी नहीं है। यह उस फैसले की कहानी है, जिसने देश के करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी, बैंकिंग व्यवस्था और भुगतान के तरीकों को प्रभावित किया। आधी रात को लिया गया वह फैसला आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी बहसों में से एक बना हुआ है।
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