लाल आतंक के गढ़ बस्तर में बदला इतिहास, जवानों के बीच पीएम मोदी ने मनाई दिवाली; बोले- नक्सलवाद के खात्मे के बाद पहली बार रोशन हुआ यह पर्व
डेस्क/रायपुर। कभी नक्सलियों के खौफ और बारूद की गूंज से पहचाने जाने वाले बस्तर में इस बार दीपावली का नजारा बिल्कुल अलग रहा। जहां कभी गोलियों की आवाज सुनाई देती थी, वहां अब शांति और विकास की नई उम्मीद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुरक्षाबलों के जवानों के साथ दीपावली मनाई। इस दौरान उन्होंने जवानों के शौर्य, बलिदान और अदम्य साहस को नमन करते हुए कहा कि नक्सलवाद के खात्मे के बाद बस्तर में यह पहली दीपावली है। यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा की बड़ी जीत का प्रतीक है।
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प्रधानमंत्री रविवार को छत्तीसगढ़ के बस्तर स्थित करनपुर पहुंचे, जहां उन्होंने तैनात सुरक्षाकर्मियों के साथ खुशियों का पर्व मनाया। जवानों के बीच पहुंचकर उन्होंने उनका उत्साह बढ़ाया और 140 करोड़ देशवासियों की ओर से उनके प्रति आभार जताया। पीएम ने कहा कि देश के इन वीर जवानों की निष्ठा और सर्वोच्च बलिदान के कारण ही नक्सलवाद के आतंक से मुक्ति का रास्ता साफ हुआ है।
47 साल के इतिहास में पहली बार जीरो कैजुअल्टी
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में एक ऐसी उपलब्धि का जिक्र किया, जो सुरक्षा बलों के लिए बड़ी राहत मानी जा रही है। उन्होंने बताया कि पिछले 47 वर्षों के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है, जब बीते एक साल के दौरान ड्यूटी पर तैनात सीआरपीएफ के किसी जवान की जान नहीं गई। उन्होंने इसे सुरक्षाबलों की बेहतर रणनीति, आधुनिक संसाधनों और मजबूत इच्छाशक्ति का परिणाम बताया।
पीएम मोदी ने पुराने हालात को याद करते हुए कहा कि एक समय ऐसा था, जब नक्सली हिंसा के कारण हर साल हजारों हमले होते थे। जवानों और आम नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ती थी। वर्ष 2010 में दंतेवाड़ा में हुए नक्सली हमले में 76 सीआरपीएफ जवानों की शहादत ने पूरे देश को झकझोर दिया था। उसी साल निर्दोष नागरिक भी नक्सली हिंसा के शिकार हुए थे।
कभी 2000 हमलों से दहलता था इलाका
मोदी ने कहा कि नक्सलवाद केवल सुरक्षा की चुनौती नहीं था, बल्कि इसने लोकतंत्र और आम लोगों के अधिकारों को भी प्रभावित किया। नक्सली दहशत के कारण कई इलाकों में लोग मतदान तक नहीं कर पाते थे। एक साल में नक्सली हमलों की संख्या 2,000 तक पहुंच जाती थी। उन्होंने कहा कि एक समय नक्सलवाद को ऐसी समस्या मान लिया गया था, जिसका कोई समाधान नहीं है, लेकिन मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और सुरक्षाबलों के साहस ने हालात बदल दिए।
आंतरिक सुरक्षा मजबूत तो दुश्मनों के हौसले पस्त
प्रधानमंत्री ने कहा कि देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले सैनिकों की तरह ही देश के भीतर सुरक्षा संभालने वाले पुलिस और अर्धसैनिक बलों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। आंतरिक सुरक्षा जितनी मजबूत होगी, बाहरी दुश्मनों को देश की ओर आंख उठाकर देखने की हिम्मत उतनी ही कम होगी।
उन्होंने कहा कि बस्तर की धरती ने लंबे समय तक हिंसा और आतंक का दर्द सहा है, लेकिन आज यहां शांति, विश्वास और विकास की नई शुरुआत हो रही है। इस बदलाव के असली नायक सुरक्षाबलों के जवान हैं, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य से कभी पीछे कदम नहीं खींचा।
2014 से जवानों के साथ दिवाली मनाने की परंपरा
प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी हर साल दीपावली का पर्व देश की सीमाओं और दुर्गम इलाकों में तैनात जवानों के साथ मनाते रहे हैं। वर्ष 2014 में सियाचिन से शुरू हुई यह परंपरा इस बार बस्तर पहुंची। इससे पहले वह लद्दाख, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और गुजरात सहित विभिन्न क्षेत्रों में जवानों के बीच दीपावली मना चुके हैं।
नक्सलवाद से मुक्ति के बाद विकास की उम्मीद
बस्तर लंबे समय तक वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ सुरक्षा अभियानों का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। यहां सीआरपीएफ और छत्तीसगढ़ पुलिस ने संयुक्त अभियानों के जरिए नक्सली नेटवर्क को कमजोर करने में अहम भूमिका निभाई। केंद्र सरकार ने 31 मार्च को देश को नक्सल समस्या से मुक्त घोषित करने की बात कही थी।
सीआरपीएफ के महानिदेशक जी.पी. सिंह ने भी लगातार 12 महीने तक ऑपरेशन के दौरान जवानों की शहादत नहीं होने की उपलब्धि का श्रेय आधुनिक उपकरणों, बेहतर प्रशिक्षण, सटीक रणनीति और घायल जवानों को समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने को दिया है।
बस्तर में जवानों के साथ प्रधानमंत्री की यह दीपावली ऐसे समय में मनाई गई, जब यह इलाका हिंसा की पुरानी पहचान से बाहर निकलकर शांति और विकास की राह पर आगे बढ़ने की उम्मीद कर रहा है। इस बार बस्तर में जलते दीप केवल त्योहार की रोशनी नहीं, बल्कि एक बदले हुए दौर का संदेश भी दे रहे थे।

