हाईकोर्ट का अहम संदेश: शादी सिर्फ सुख में साथ निभाने का नाम नहीं, मुश्किल वक्त में भी थामना होगा एक-दूसरे का हाथ-
–पत्नी को मानसिक बीमार बताकर पति ने मांगा था तलाक, ठोस सबूत नहीं मिलने पर हाईकोर्ट ने खारिज की अपील; कहा- महज असामान्य व्यवहार से किसी को मानसिक रोगी नहीं ठहराया जा सकता
राँची।वैवाहिक रिश्ते में मुश्किलें आएं तो एक-दूसरे का हाथ छोड़ देना आसान है, लेकिन शादी की असली परीक्षा कठिन परिस्थितियों में साथ निभाने से होती है। इसी सामाजिक और मानवीय पहलू को रेखांकित करते हुए झारखण्ड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। पत्नी को मानसिक रूप से अस्वस्थ बताकर उससे तलाक मांगने वाले पति को अदालत से राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि केवल कुछ असामान्य व्यवहार या सामान्य आरोपों के आधार पर किसी को मानसिक रोगी मान लेना और विवाह खत्म करने की मांग करना उचित नहीं है।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने पति की अपील खारिज करते हुए चतरा फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। फैमिली कोर्ट ने 7 सितंबर 2024 को पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। पति ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन वहां भी उसके आरोप कानूनी कसौटी पर खरे नहीं उतर सके।
शादी से पहले बीमारी छिपाने का लगाया था आरोप
मामले के अनुसार, पति-पत्नी की शादी 31 जनवरी 2016 को हुई थी। दोनों का एक बेटा भी है। पति सीआईएसएफ में कार्यरत था और उसकी पोस्टिंग राजस्थान के कोटा में थी। पति ने अदालत में आरोप लगाया था कि शादी के शुरुआती दिनों से ही पत्नी का व्यवहार असामान्य और आक्रामक था। वह बिना वजह हंसती थी, खुद से बातें करती थी और रिश्तेदारों के सामने भी उचित कपड़ों के बिना आ जाती थी।
पति का दावा था कि पत्नी की मानसिक स्थिति से जुड़ी जानकारी शादी से पहले छिपाई गई थी। इसी आधार पर उसने क्रूरता और मानसिक बीमारी का हवाला देते हुए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक मांगा था।वहीं, पत्नी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए पति पर दहेज में पांच लाख रुपये मांगने और प्रताड़ित करने का आरोप लगाया था।
अदालत में आरोपों के समर्थन में नहीं मिले ठोस प्रमाण
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि पति और उसके गवाह पत्नी की ओर से कथित शारीरिक हिंसा, गाली-गलौज या प्रताड़ना की किसी विशिष्ट घटना का स्पष्ट विवरण नहीं दे सके। आरोप सामान्य प्रकृति के थे और उनके समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य भी पेश नहीं किए गए थे।
अदालत ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि पति के परिवार के सदस्य शादी से पहले ही पत्नी को जानते थे। ऐसे में मानसिक बीमारी की जानकारी छिपाने का पति का दावा भी भरोसेमंद नहीं लगा।
मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट ने भी पति के दावे को नहीं दिया आधार
पति ने डॉ. एम. जलील की मनोवैज्ञानिक जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए पत्नी को स्किजोफ्रेनिया जैसी बीमारी होने का दावा किया था। लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि रिपोर्ट में न तो इस बीमारी की स्पष्ट पुष्टि की गई थी और न ही पत्नी की स्थिति को लाइलाज बताया गया था।
मामले में राँची स्थित रिनपास में मेडिकल बोर्ड ने भी पत्नी की जांच की थी। दोनों पक्षों की मौजूदगी में हुई जांच के बाद बोर्ड ने पत्नी में किसी मानसिक बीमारी के लक्षण नहीं पाए। पति ने बोर्ड की रिपोर्ट पर सवाल तो उठाए, लेकिन उसके किसी सदस्य से जिरह करने की मांग तक नहीं की।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(iii) के तहत मानसिक बीमारी तलाक का आधार तभी बन सकती है, जब बीमारी की प्रकृति और गंभीरता ऐसी हो कि दूसरे पक्ष से साथ रहना उचित रूप से संभव न हो। इसके लिए विशेषज्ञ साक्ष्य जरूरी हैं। केवल एक-दो घटनाओं या व्यवहार के आधार पर मानसिक बीमारी साबित नहीं होती।
बेटे की देखभाल कर रही थी पत्नी, साथ रहने की भी जताई इच्छा
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पत्नी न्यायालय में पूछे गए सवालों का सामान्य और उचित तरीके से जवाब दे रही थी। वह अपने बेटे की देखभाल कर रही थी और पति के साथ दोबारा वैवाहिक जीवन शुरू करने की इच्छा भी जता चुकी थी।इसके विपरीत, पति ने स्वीकार किया कि उसने पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण के लिए कोई आर्थिक सहायता नहीं दी थी।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का हवाला, विवाह के सामाजिक महत्व पर जोर
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए भारतीय समाज में विवाह के महत्व को रेखांकित किया। अदालत ने कहा कि वैवाहिक जीवन में अच्छे और बुरे दोनों तरह के दिन आते हैं। बीमारी, परेशानियां और कठिन परिस्थितियां भी जीवन का हिस्सा हैं। ऐसे समय में पति-पत्नी से अपेक्षा की जाती है कि वे एक-दूसरे का सहारा बनें और मिलकर चुनौतियों का सामना करें।
अदालत के इस फैसले में एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश भी सामने आया है कि विवाह केवल सुख और सुविधा के दिनों में साथ रहने का रिश्ता नहीं है। इसकी वास्तविक कसौटी तब सामने आती है, जब जीवन कठिन दौर से गुजर रहा हो।
तमाम तथ्यों और साक्ष्यों की समीक्षा के बाद हाईकोर्ट ने माना कि पति न तो क्रूरता के आरोप साबित कर सका और न ही पत्नी की ऐसी गंभीर मानसिक बीमारी का प्रमाण दे पाया, जो कानून के तहत तलाक का आधार बन सके। इसके साथ ही अदालत ने पति की अपील खारिज कर चतरा फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ज्योति नयन ने पक्ष रखा।

