करम पर्व की पूर्व संध्या पर मांदर की थाप पर झूमे डीसी-एसएसपी, समाहरणालय में दिखी झारखण्डी संस्कृति की रंगत
राँची। करम पर्व की पूर्व संध्या पर शुक्रवार को राँची के समाहरणालय का माहौल पूरी तरह झारखंडी संस्कृति के रंग में रंग गया। ब्लॉक-बी सभागार में आयोजित करमा पूर्व संध्या समारोह में पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य की ऐसी छटा बिखरी कि अधिकारी से लेकर कर्मचारी तक उत्साह में झूम उठे। कार्यक्रम में जिला दंडाधिकारी सह उपायुक्त मंजूनाथ भजन्त्री और वरीय पुलिस अधीक्षक राकेश रंजन भी शामिल हुए। दोनों अधिकारियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर समारोह का शुभारंभ किया।
समाहरणालय कर्मियों ने पारंपरिक पगड़ी और शॉल भेंट कर डीसी और एसएसपी का स्वागत किया। इसके बाद करमा गीतों और आकर्षक पारंपरिक नृत्य प्रस्तुतियों का दौर शुरू हुआ। गीतों की मधुर धुन और नर्तकों के कदमों ने पूरे सभागार को उत्सव के रंग में रंग दिया। माहौल ऐसा बना कि मौजूद लोग खुद को मांदर की थाप और करमा गीतों से जुड़ने से रोक नहीं सके।
मांदर की थाप पर डीसी ने भी बढ़ाया उत्साह
समारोह का सबसे खास पल उस वक्त आया, जब उपायुक्त मंजूनाथ भजन्त्री ने स्वयं मांदर संभाल लिया। मांदर की थाप के साथ उन्होंने अपनी खुशी का इजहार किया तो पूरा सभागार तालियों और उत्साह से गूंज उठा। अधिकारियों और कर्मचारियों ने भी पारंपरिक अंदाज में करमा पर्व की खुशियां साझा कीं।
इस दौरान एसएसपी राकेश रंजन भी कार्यक्रम में पूरी आत्मीयता के साथ शामिल रहे। करमा गीत, मांदर और पारंपरिक नृत्य के बीच समाहरणालय परिसर में झारखंड की सांस्कृतिक विरासत की जीवंत तस्वीर देखने को मिली।
डीसी बोले- करमा प्रकृति से जुड़ाव और संरक्षण का पर्व
उपायुक्त मंजूनाथ भजन्त्री ने कहा कि करमा केवल उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और उसके संरक्षण का संदेश देने वाला पर्व है। उन्होंने कहा कि प्रकृति की पूजा और प्रार्थना का उद्देश्य यही है कि आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित रहें और मनुष्य प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन व्यतीत करे।
उन्होंने कहा, “यहां की संस्कृति, वेशभूषा, खान-पान, नृत्य और विशेष रूप से पेड़ों तथा प्रकृति के प्रति लोगों का गहरा प्रेम मुझे बहुत प्रभावित करता है। यहां के लोग अपनी परंपराओं को सहेजकर आगे बढ़ा रहे हैं।”
उपायुक्त ने समाहरणालय कर्मियों की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि यह खुशी की बात है कि प्रशासनिक कार्यों के साथ-साथ कर्मी अपनी संस्कृति और परंपराओं से भी गहराई से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि प्रकृति और परंपरा के प्रति यह लगाव समाज के लिए प्रेरणादायी उदाहरण है।
“झारखण्ड की आदिवासी संस्कृति से सीखने की जरूरत”
उपायुक्त ने कहा कि करमा प्रकृति का पर्व है और झारखण्ड के आदिवासी समुदाय से यह सीखने की जरूरत है कि प्रकृति के साथ किस तरह संतुलन बनाकर जीवन जिया जाता है। उन्होंने अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।उन्होंने एसएसपी राकेश रंजन के प्रकृति पर्व से जुड़ाव की भी सराहना की। कहा कि प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ अपनी संस्कृति और परंपरा से जुड़ना सकारात्मक संदेश देता है।
गीत-संगीत और नृत्य से गूंजा समाहरणालय
समाहरणालय कर्मियों की ओर से प्रस्तुत करमा गीत और पारंपरिक नृत्य ने समारोह में चार चांद लगा दिए। मांदर की थाप, पारंपरिक वेशभूषा और लोकगीतों ने सभागार में झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर दिया। कार्यक्रम में मौजूद अधिकारी और कर्मचारी भी इस सांस्कृतिक उत्सव का हिस्सा बने।
करमा पूर्व संध्या का यह आयोजन सिर्फ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि प्रकृति, परंपरा और झारखंडी पहचान को सहेजने का संदेश देने वाला आयोजन बन गया।
कार्यक्रम में उप विकास आयुक्त संजय भगत, अनुमंडल पदाधिकारी सदर कुमार रजत, ट्रेनी आईएएस अधिकारी आस्था शरण, अपर प्रशासक राँची नगर निगम संजय कुमार, परियोजना निदेशक ITDA मनीषा तिर्की, जिला परिवहन पदाधिकारी अखिलेश कुमार, नजारत उप समाहर्ता डॉ. सुदेश कुमार समेत समाहरणालय के अधिकारी-कर्मचारी मौजूद रहे।

