आधी रात का ‘एक्शन’ और प्रशासनिक महकमे में उबाल: बुढ़मू सीओ की गिरफ्तारी पर भड़का संघ, एसीबी के खिलाफ खोला मोर्चा

राँची।झारखण्ड के प्रशासनिक गलियारों में इस समय भारी हलचल है।राँची के बुढ़मू के अंचल अधिकारी (सीओ) सच्चिदानंद कुमार वर्मा की आधी रात को हुई गिरफ्तारी ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस कार्रवाई के विरोध में झारखण्ड प्रशासनिक सेवा संघ पूरी तरह से आक्रामक रुख अपना चुका है। आज (12 जुलाई 2026) आयोजित एक आपातकालीन बैठक में संघ ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी की इस कार्रवाई को पूरी तरह से अवैध, असंवैधानिक और दमनकारी करार दिया है।संघ का साफ कहना है कि अगर अधिकारी को न्याय नहीं मिला, तो पूरे राज्य में चरणबद्ध आंदोलन छेड़ा जाएगा।

आधी रात को दबिश: संघ ने उठाए गंभीर कानूनी सवाल
संघ ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर आरोप लगाया है कि एसीबी ने इस पूरी कार्रवाई में स्थापित कानूनों और सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों की धज्जियां उड़ा दी हैं। संघ द्वारा उठाए गए मुख्य विधिक बिंदु इस प्रकार हैं:
धारा 17A (P.C. Act) का उल्लंघन: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत किसी लोक सेवक के खिलाफ आधिकारिक कार्यों से जुड़े मामले में कार्रवाई से पहले सक्षम प्राधिकारी की अनुमति अनिवार्य होती है। चूंकि सीओ को रंगे हाथ नहीं पकड़ा गया और न ही कोई वित्तीय बरामदगी हुई, इसलिए बिना अनुमति यह कार्रवाई पूरी तरह गैर-कानूनी है।
’डी. के. बासु’ गाइडलाइंस की अनदेखी: पहले आरोपी को शाम 7:00 बजे पकड़ने के बाद, सीओ को तड़के सुबह 3:00 बजे उनके सरकारी आवास से उठाया गया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, बिना किसी असाधारण परिस्थिति के किसी प्रतिष्ठित अधिकारी को रात के अंधेरे में इस तरह अपमानजनक ढंग से गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। परिवार को भी इसकी समय पर सूचना नहीं दी गई।
BNSS की अवहेलना: 7 वर्ष से कम सजा वाले मामलों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35 के तहत पहले नोटिस देना जरूरी होता है, जिसका पालन नहीं किया गया।
सबूतों का अभाव: सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक भ्रष्टाचार के मामले में रिश्वत की सीधी मांग और स्वीकार्यता मुख्य आधार होती है। इस मामले में सीओ के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है। केवल पुलिस हिरासत में किसी सह-आरोपी द्वारा दिए गए बयान की अदालत में कोई कानूनी वैधता नहीं होती।
प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि जिस नामांतरण (म्यूटेशन) वाद (संख्या 1131 R27/2025-2026/बुढ़मू) को आधार बनाकर यह कार्रवाई की गई है, उसे लेकर संघ ने एक बड़ा खुलासा किया है:”अंचल अधिकारी ने नियमों के तहत इस आवेदन को 12 मई 2026 को ही खारिज कर दिया था। स्थल निरीक्षण के दौरान यह पाया गया था कि जमीन पर खरीदार का वास्तविक दखल-कब्जा नहीं था और भूमि पूरी तरह से विवादित थी। यह आदेश झारभूमि पोर्टल पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। जब फैसला पूरी तरह से नियमों और जांच रिपोर्ट पर आधारित था, तो इसे आपराधिक साजिश कैसे माना जा सकता है?” संघ का सीधा दावा है कि अंचल अधिकारी किसी भ्रष्टाचार में शामिल नहीं हैं, बल्कि वे भू-माफिया की एक बड़ी साजिश का शिकार हुए हैं।
मामले की तह तक जाने के लिए संघ ने मूकदर्शक बने रहने के बजाय खुद मोर्चा संभाल लिया है:
फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन: मामले की निष्पक्ष जांच के लिए अपर सचिव स्तर के अधिकारी की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाई गई है, जो अपनी रिपोर्ट सौंपेगी।
उच्च स्तरीय जांच की मांग: संघ ने राज्य सरकार से इस पूरे प्रकरण की तत्काल और निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है।
दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई: नियम-कायदों को ताक पर रखकर कार्रवाई करने वाले ACB अधिकारियों के खिलाफ कड़ा एक्शन लिया जाए।
स्पष्ट SOP की मांग: भविष्य में ऐसी मनमानी रोकने के लिए एसीबी की कार्रवाइयों के संदर्भ में एक स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाई जाए और उसका सख्ती से पालन हो।
झारखण्ड प्रशासनिक सेवा संघ ने स्पष्ट कर दिया है कि वे भ्रष्टाचार का समर्थन नहीं करते, लेकिन कानून के नाम पर अधिकारियों के मनोबल को तोड़ने वाली इस दमनकारी कार्यशैली को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। न्याय न मिलने की स्थिति में राज्यव्यापी आंदोलन तय है।

