सर, मेरा क्या कसूर है?’—कल तक सचिवालय में फाइल चला रहे थे, आज बारिश में नौकरी बचाने के लिए गेट पर बैठे 1975 कर्मचारी

 

राँची।कल तक जिन हाथों में सरकारी फाइलें थीं, जिन युवाओं के नाम के आगे सरकारी कर्मचारी लिखा जा चुका था, जिनके परिवारों ने वर्षों की मेहनत के बाद मिली नौकरी को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि माना था।मंगलवार की सुबह वही हाथ प्रोजेक्ट भवन के गेट के बाहर मदद और जवाब मांगते नजर आए।
आसमान से लगातार बारिश हो रही थी। कपड़े भीग चुके थे। चेहरे पर थकान थी और आंखों में भविष्य की चिंता। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल बार-बार सुनाई दे रहा था—“सर, मेरा क्या कसूर है?” यह सवाल उन करीब 1975 चयनित कर्मियों का है, जिनकी नौकरी पर JSSC CGL-2023 की परीक्षा, परिणाम और चयन प्रक्रिया रद्द किए जाने के फैसले के बाद संकट खड़ा हो गया है। मंगलवार को बड़ी संख्या में प्रभावित कर्मचारी राँची स्थित प्रोजेक्ट भवन पहुंचे, लेकिन उन्हें सचिवालय परिसर के भीतर प्रवेश नहीं दिया गया। इसके बाद वे मुख्य प्रवेश द्वार के बाहर ही धरने पर बैठ गए। भारी बारिश भी उनके विरोध और पीड़ा को नहीं रोक सकी।

एक रात में बदल गई जिंदगी
प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों के लिए यह सिर्फ किसी परीक्षा का रद्द होना नहीं है। उनके लिए यह उस सपने का टूटना है, जिसके लिए उन्होंने कई साल पढ़ाई की, प्रतियोगी परीक्षाएं दीं, असफलताओं का सामना किया और आखिरकार सरकारी नौकरी हासिल की।
कई कर्मचारी बताते हैं कि नियुक्ति के बाद वे बाकायदा अपने विभागों में योगदान दे रहे थे। कोई सहायक प्रशाखा पदाधिकारी (ASO) के रूप में काम कर रहा था, कोई अंचल निरीक्षक (CI) तो कोई LDC के पद पर सरकारी व्यवस्था का हिस्सा बन चुका था।

अब सवाल यह है कि अगर पूरी चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी थी, तो उसमें सफल होकर नियुक्ति पाने वाले हर अभ्यर्थी को एक साथ दोषी क्यों माना जाए? यही सवाल मंगलवार को प्रोजेक्ट भवन के बाहर बैठे कर्मचारियों की जुबान पर था।

“हमें कोई लिखित नोटिस तक नहीं मिला”
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्हें सेवा समाप्त करने या कार्यालय नहीं आने के संबंध में कोई स्पष्ट लिखित नोटिस नहीं मिला। इसके बावजूद मंगलवार को उन्हें सचिवालय के मुख्य गेट पर रोक दिया गया।कर्मचारियों का कहना है कि सरकार यदि उनकी नियुक्ति को लेकर कोई फैसला कर चुकी है तो उन्हें उसका स्पष्ट लिखित आदेश दिया जाए और यह बताया जाए कि उनकी व्यक्तिगत गलती क्या है।उनकी मांग है कि सरकार पूरे मामले पर पुनर्विचार करे और चयनित अभ्यर्थियों को अपना पक्ष रखने का अवसर दे। मंगलवार को इसी मांग को लेकर कर्मचारी बारिश में भी सचिवालय के बाहर बैठे रहे।

बारिश में भीगती रही एक महिला कर्मचारी, रोकर पूछा—“मेरा क्या कसूर है?”

प्रदर्शन के बीच एक महिला कर्मचारी की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। बारिश ने उसके कपड़ों को पूरी तरह भिगो दिया था, लेकिन शायद उस समय उसे इसकी परवाह भी नहीं थी।
रोते हुए वह बस यही कहती रही—“सर, मेरा क्या कसूर है?”
उसका कहना था कि उसने नौकरी के लिए वर्षों तक मेहनत की। कई बार परीक्षाएं दीं। हर असफलता के बाद फिर तैयारी की। आखिरकार इस बार सफलता मिली तो लगा कि संघर्ष खत्म हो गया।मध्यमवर्गीय परिवार में पहली बार सरकारी नौकरी मिलने की खुशी ऐसी थी कि पूरा परिवार झूम उठा था। घर में मिठाई बंटी, रिश्तेदारों को बताया गया और परिवार ने बेटी के सुरक्षित भविष्य के सपने देखने शुरू कर दिए।लेकिन सोमवार की रात आई खबर ने उसी घर की खुशी को मातम जैसी चिंता में बदल दिया। “हमने क्या गलत किया था? हमने तो परीक्षा दी, मेहनत की और सफल हुए। अगर कहीं गड़बड़ी हुई है तो हमें बताइए। हमारा परिवार क्या करे?”उस महिला का सवाल सिर्फ उसका सवाल नहीं था। मंगलवार को प्रोजेक्ट भवन के बाहर बैठे कई कर्मचारियों की कहानी लगभग यही थी।

किसी की शादी की तैयारी थी, किसी पर परिवार की जिम्मेदारी
नौकरी गंवाने का डर सिर्फ वेतन बंद होने का डर नहीं है। इसके साथ जुड़े हैं परिवार के सपने, लोन की किस्तें, बच्चों की पढ़ाई, माता-पिता की जिम्मेदारी और आने वाले जीवन की योजनाएं।
ताजा रिपोर्टों में प्रभावित अभ्यर्थियों ने बताया है कि किसी की शादी तय थी, किसी को माता-पिता और बच्चों की चिंता है, जबकि कुछ लोगों ने इस सरकारी नौकरी के भरोसे दूसरी नौकरियां तक छोड़ दी थीं।यानी जिन लोगों ने नियुक्ति पत्र को जीवन की स्थिरता का प्रमाण माना था, उनके सामने अब फिर से वही अनिश्चितता खड़ी हो गई है, जिससे वे वर्षों की मेहनत के बाद बाहर निकले थे।

विडंबना देखिए—जिस सरकार ने नियुक्ति पत्र बांटे, उसी फैसले के बाद नौकरी पर संकट

इस पूरे मामले का सबसे भावनात्मक पहलू यह भी है कि दिसंबर 2025 में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने स्वयं JSSC CGL-2023 के चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र वितरित किए थे।
मुख्यमंत्री कार्यालय की आधिकारिक जानकारी के अनुसार 30 दिसंबर 2025 को मोरहाबादी मैदान में आयोजित कार्यक्रम में 1,910 चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र दिए गए थे। उस समय मुख्यमंत्री ने चयनित युवाओं की मेहनत और संघर्ष की सराहना करते हुए कहा था कि लंबे संघर्ष के बाद उन्हें सफलता मिली है।उस वक्त जिन घरों में नौकरी मिलने की खुशी थी, उन्हीं में अब भविष्य को लेकर चिंता है।यही वजह है कि प्रभावित कर्मचारी पूछ रहे हैं—“जब नियुक्ति मिली, योगदान लिया गया और हम काम कर रहे थे, तो अब अचानक हमारी गलती क्या निकल आई?”

सरकार का फैसला क्यों आया?
JSSC CGL को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। परीक्षा प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर अभ्यर्थियों का आंदोलन तेज हुआ। CID की कार्रवाई, जांच और विरोध-प्रदर्शनों के बीच सरकार पर परीक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे थे। घटनाक्रम में JPSC-JSSC से जुड़ी गतिविधियों और जांच का सिलसिला जुलाई से लगातार तेज हुआ।इसके बाद 17 अगस्त 2026 को झारखण्ड सरकार ने JSSC-CGL परीक्षा को रद्द करने का फैसला किया। वहीं, सरकार ने TDPL से जुड़ी अन्य परीक्षाओं पर भी कार्रवाई का फैसला लिया है और 2014 से भर्ती परीक्षाओं में हुई संभावित गड़बड़ियों की व्यापक जांच की बात कही है।

इधर,छात्र आंदोलन से जुड़े नेताओं ने इसे परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की दिशा में बड़ी जीत बताया है और कहा है कि अब भर्ती प्रक्रिया में स्थायी सुधार की जरूरत है।लेकिन असली सवाल अब 1975 कर्मचारियों का हैपरीक्षा में यदि गड़बड़ी हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। दोषियों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन इसी के साथ दूसरा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है—क्या पूरी चयन प्रक्रिया में शामिल हर सफल अभ्यर्थी दोषी है?
यही वह बिंदु है जिस पर अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।एक तरफ वे अभ्यर्थी हैं जो कथित अनियमितताओं के खिलाफ परीक्षा रद्द करने की मांग कर रहे थे। दूसरी तरफ वे युवा हैं जिन्होंने उसी परीक्षा को पास कर नियुक्ति हासिल की और अब खुद को उस विवाद का सबसे बड़ा पीड़ित बता रहे हैं।दोनों पक्षों के दर्द अलग हैं, लेकिन दोनों के केंद्र में एक ही चीज है—सरकारी भर्ती व्यवस्था पर भरोसा।

प्रोजेक्ट भवन के बाहर बढ़ी सुरक्षा, अंदर बढ़ी बेचैनी
मंगलवार को कर्मचारियों के प्रदर्शन को देखते हुए प्रोजेक्ट भवन के मुख्य प्रवेश द्वार पर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गई। बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात रहा और कर्मचारियों को परिसर के भीतर जाने से रोका गया। इसके बाद कर्मचारियों ने गेट के बाहर ही बैठकर विरोध दर्ज कराया।बारिश लगातार होती रही, लेकिन कर्मचारी अपनी जगह से नहीं हटे।किसी के हाथ में नियुक्ति पत्र की प्रति थी तो किसी के मोबाइल में नौकरी मिलने का पुराना संदेश। किसी की आंखों में गुस्सा था तो किसी की आंखों में आंसू।

अब सरकार के सामने तीन बड़े सवाल
इस पूरे विवाद में अब सरकार के सामने तीन बड़े सवाल खड़े हो गए हैं—पहला, नियुक्ति पा चुके 1975 कर्मियों की सेवा को लेकर अंतिम और स्पष्ट निर्णय क्या होगा? दूसरा, जिन कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें कोई लिखित नोटिस नहीं मिला, उन्हें उनकी स्थिति के बारे में औपचारिक रूप से कब बताया जाएगा?तीसरा, यदि परीक्षा प्रक्रिया में अनियमितता हुई है तो व्यक्तिगत रूप से निर्दोष चयनित अभ्यर्थियों के भविष्य की सुरक्षा कैसे की जाएगी?
इन सवालों का जवाब जितनी जल्दी मिलेगा, उतनी ही जल्दी प्रोजेक्ट भवन के बाहर बैठे इन युवाओं की बेचैनी कम होगी।

एक तरफ ‘परीक्षा रद्द होने की खुशी’, दूसरी तरफ ‘नौकरी जाने का मातम’

JSSC CGL को लेकर झारखण्ड में इस समय एक अजीब विरोधाभास दिखाई दे रहा है।एक तरफ परीक्षा रद्द होने के बाद आंदोलन कर रहे अभ्यर्थी इसे अपनी जीत बता रहे हैं। दूसरी तरफ उसी परीक्षा के जरिए सरकारी नौकरी पा चुके कर्मचारी अपनी नौकरी बचाने के लिए बारिश में सड़क पर बैठे हैं।एक पक्ष कह रहा है—“परीक्षा में गड़बड़ी हुई तो परीक्षा रद्द होनी चाहिए।” दूसरा पक्ष पूछ रहा है—“अगर गड़बड़ी हमने नहीं की तो सजा हमें क्यों?”और इन दोनों सवालों के बीच फंसा है झारखण्ड के सरकारी भर्ती तंत्र पर युवाओं का भरोसा।

 

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