वैशाली नाव हादसा: 13 बच्चों की मौत के बाद उठे गंभीर सवाल, जर्जर नाव पर सवार क्यों हुए 25 बच्चे…

वैशाली।बिहार के वैशाली जिले के राघोपुर में नाव हादसे ने कई परिवारों की खुशियां छीन लीं। गंगा के पानी से बने जलभराव वाले इलाके में नाव पलटने से 13 बच्चों की मौत हो गई, जबकि नौ बच्चे अब भी लापता बताए जा रहे हैं। तीन बच्चों को जीवित बचा लिया गया। ये बच्चे मंगलवार शाम पड़ोसी गांव में श्राद्ध का भोज खाने जा रहे थे, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही दूरी का यह सफर इतनी बड़ी त्रासदी में बदल जाएगा।

यह हादसा केवल नाव पलटने की घटना नहीं है। इसके पीछे कई ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब मिलना जरूरी है। जिस नाव पर बच्चे सवार थे, उसकी हालत जर्जर बताई जा रही है। दावा है कि नाव पहले सरकारी थी, लेकिन पुरानी होने के कारण उसे परित्यक्त घोषित कर दिया गया था। बाद में ग्रामीणों ने उसकी मरम्मत कर उसे इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। सवाल है कि जब नाव पहले ही अनुपयोगी घोषित हो चुकी थी, तो वह दोबारा बच्चों की आवाजाही का साधन कैसे बन गई?

जर्जर नाव पर सवार 25 बच्चे, चंद मिनटों में मचा मातम

रामपुर श्यामचंद पंचायत के एक ही टोले के करीब 25 बच्चे पड़ोसी गांव में श्राद्ध का भोज खाने जा रहे थे। दोनों गांवों के बीच करीब 300 मीटर चौड़ा जलभराव वाला क्षेत्र है। इसे पार करने के लिए बच्चों को नाव का सहारा लेना पड़ा। ग्रामीणों के मुताबिक, नाव में दरार थी और उसकी स्थिति भी ठीक नहीं थी।

बताया जाता है कि नाव किनारे से आगे बढ़ी तो डगमगाने लगी। बीच पानी में पहुंचते-पहुंचते उसमें पानी भरने लगा। इसके बाद नाव का संतुलन बिगड़ा और वह पलट गई। देखते ही देखते बच्चे पानी में डूबने लगे। उनकी चीख-पुकार सुनकर आसपास के ग्रामीण बचाव के लिए दौड़े और कई लोग अपनी जान जोखिम में डालकर पानी में उतर गए।

हादसे में 13 बच्चों की मौत की खबर ने पूरे इलाके को शोक में डुबो दिया। तीन बच्चों को जीवित बचाया गया, जबकि नौ बच्चों के लापता होने की सूचना सामने आई। एक ही परिवार की सात बच्चियों की मौत की खबर ने त्रासदी को और भी दर्दनाक बना दिया।

जब नाव में दरार थी, तो बच्चों को उस पर बैठने क्यों दिया गया?

इस हादसे का सबसे बड़ा सवाल यही है। क्या नाव की हालत के बारे में ग्रामीणों को जानकारी थी? क्या नाव में सफर करना सुरक्षित था? क्या उसमें क्षमता से अधिक बच्चे सवार थे? और अगर नाव वास्तव में जर्जर थी, तो उसे बच्चों की आवाजाही के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति किसने दी?

इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट होंगे। फिलहाल, नाव की वास्तविक स्थिति, उसकी मरम्मत और उसके इस्तेमाल से जुड़े तथ्यों की जांच जरूरी है। यह भी पता लगाना होगा कि नाव को परित्यक्त घोषित करने के बाद उसे किसने और किन परिस्थितियों में दोबारा चलाना शुरू किया।

गांवों के बीच नाव ही रास्ता, तो सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी?

ग्रामीण इलाकों में नदियों और जलभराव वाले क्षेत्रों को पार करना लोगों की रोजमर्रा की मजबूरी है। कई जगह स्कूल, बाजार, अस्पताल और दूसरे गांवों तक पहुंचने के लिए नाव ही एकमात्र व्यावहारिक साधन होती है। लेकिन मजबूरी का मतलब यह नहीं हो सकता कि लोगों की सुरक्षा को किस्मत के भरोसे छोड़ दिया जाए।

यदि किसी इलाके में नाव से आवागमन जरूरी है, तो सुरक्षित नाव उपलब्ध कराने, उसकी नियमित जांच कराने और उसकी क्षमता के अनुसार ही यात्रियों को बैठाने की व्यवस्था होनी चाहिए। नावों में पर्याप्त सुरक्षा उपकरण और आपात स्थिति में बचाव के इंतजाम भी जरूरी हैं।

वैशाली हादसे के बाद यह जानना अहम है कि संबंधित इलाके में नावों की नियमित जांच होती थी या नहीं। क्या असुरक्षित नावों को चलने से रोकने के लिए कोई व्यवस्था थी? क्या ग्रामीणों के लिए कोई वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध था? यदि नहीं, तो सुरक्षित आवागमन की जिम्मेदारी किस विभाग या प्राधिकरण की थी?

हादसे के बाद राहत-बचाव व्यवस्था पर भी सवाल

नाव पलटने के बाद आसपास के ग्रामीणों ने बचाव अभियान शुरू किया। स्थानीय लोगों के मुताबिक, ग्रामीणों ने घंटों मशक्कत कर बच्चों को पानी से बाहर निकाला। रात का अंधेरा और पानी की गहराई राहत कार्य में चुनौती बने। ग्रामीणों ने एंबुलेंस के समय पर नहीं पहुंचने की भी शिकायत की। कुछ बच्चों को खाट पर लादकर अस्पताल ले जाने की बात सामने आई।

मुआवजा मिलेगा, लेकिन बच्चों की मौत का जवाब कौन देगा?

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने हादसे पर दुख जताते हुए मृतकों के परिजनों को चार-चार लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की। तेजस्वी यादव ने भी राहत और बचाव अभियान तेज करने के निर्देश दिए।मुआवजा पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता दे सकता है, लेकिन अपने बच्चों को खोने का दर्द कभी कम नहीं कर सकता। ऐसे में केवल आर्थिक मदद पर्याप्त नहीं है। हादसे की निष्पक्ष जांच कर यह पता लगाना भी जरूरी है कि दुर्घटना किन परिस्थितियों में हुई और कहीं किसी स्तर पर लापरवाही तो नहीं बरती गई।

जांच में नाव की स्थिति, उसके इस्तेमाल की अनुमति, यात्रियों की संख्या, सुरक्षा इंतजाम और प्रशासनिक निगरानी जैसे पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए। यदि किसी की लापरवाही सामने आती है, तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

 

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