बिहार का चमत्कारी शक्तिपीठ… तिलडीहा दुर्गा मंदिर में उमड़ा आस्था का सैलाब, पहली पूजा पर एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने चढ़ाया जल

 

मुंगेर/बांका। बिहार के बांका जिले के शंभुगंज प्रखंड स्थित प्रसिद्ध तिलडीहा दुर्गा मंदिर में शारदीय नवरात्र के पहले दिन से ही श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा है। मां दुर्गा के इस प्राचीन दरबार में भक्तों की अटूट आस्था का नजारा देखने को मिल रहा है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नत मां भगवती जरूर पूरी करती हैं। यही वजह है कि बिहार के विभिन्न जिलों के अलावा दूसरे राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंच रहे हैं।

पहली पूजा पर उमड़ी भारी भीड़, 18 किलोमीटर पैदल चलकर पहुंचे भक्त

नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना के अवसर पर एक लाख से अधिक महिला-पुरुष श्रद्धालुओं के मंदिर पहुंचने की जानकारी सामने आई है। श्रद्धालु सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से पवित्र जल भरकर कांवर यात्रा पर निकले। करीब 18 किलोमीटर की पैदल यात्रा पूरी कर भक्त जय दुर्गे के जयघोष के साथ हरिवंशपुर स्थित तिलडीहा दुर्गा मंदिर पहुंचे और माता का जलाभिषेक किया।
भक्तों की भीड़ इतनी अधिक थी कि मंदिर तक पहुंचना और माता के दरबार को स्पर्श करना मुश्किल हो गया। कई श्रद्धालुओं ने भीड़ के कारण दूर से ही जल अर्पित किया। मंदिर परिसर के आसपास भी भारी भीड़ जमा रही। श्रद्धालुओं की आवाजाही के कारण मंदिर से दो से तीन किलोमीटर दूर तक सड़क पर जाम की स्थिति बन गई।

400 साल से अधिक पुराना है मां तिलडीहा का दरबार
बांका और मुंगेर जिले की सीमा के निकट स्थित तिलडीहा दुर्गा मंदिर अंग क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1603 ईस्वी में हुई थी। करीब चार शताब्दियों से अधिक पुराना यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र बना हुआ है।मंदिर को सिद्ध शक्तिपीठ के रूप में भी मान्यता प्राप्त है। यहां मां दुर्गा की पूजा पारंपरिक तांत्रिक विधि से किए जाने की मान्यता है। नवरात्र के दौरान विशेष पूजा-अर्चना के लिए दूर-दराज से श्रद्धालु और साधक पहुंचते हैं।

एक ही मेढ़ पर मां काली, भगवान कृष्ण और मां भवानी
तिलडीहा मंदिर की एक खास धार्मिक विशेषता यहां स्थापित प्रतिमाओं को लेकर है। मान्यता के अनुसार, मंदिर में एक ही मेढ़ पर मां काली, भगवान कृष्ण और मां भवानी विराजमान हैं। भक्त इसे मंदिर की विशिष्ट परंपरा और आध्यात्मिक महत्ता से जोड़कर देखते हैं।

मंदिर के बारे में प्रचलित कथाओं के अनुसार, लगभग 400 वर्ष पहले बंगाल निवासी हरबल्लभ दास पारिवारिक विवाद के बाद घर छोड़कर ऐसे स्थान की तलाश में निकले थे, जहां नदी और श्मशान घाट हो। बताया जाता है कि उन्हें बड़ुआ नदी के पश्चिम और दक्षिण दिशा में श्मशान घाट मिला। इसके बाद उन्होंने वहां तांत्रिक विधि से साधना की और मां काली, मां दुर्गा तथा भगवान कृष्ण की स्थापना की। तभी से यहां पूजा की परंपरा जारी रहने की मान्यता है।

आज भी मिट्टी की है माता की पिंडी, नहीं बदली गई परंपरा
समय के साथ मंदिर का स्वरूप बदला है। पहले खपरैल का मंदिर था, जो अब पक्के भवन में बदल चुका है। लेकिन स्थानीय मान्यता के अनुसार, मंदिर के भीतर माता की पिंडी आज भी मिट्टी की ही है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि माता की इच्छा के कारण पिंडी के मूल स्वरूप में बदलाव नहीं किया गया है।यह परंपरा मंदिर की प्राचीन पहचान से जुड़ी हुई है और भक्त इसे विशेष श्रद्धा के साथ देखते हैं। नवरात्र के दौरान महिलाएं दूर-दराज से लाल चुनरी और डलिया चढ़ाने पहुंचती हैं।

अष्टमी-नवमी पर बलि प्रदान की पुरानी परंपरा
तिलडीहा दुर्गा मंदिर में नवरात्र की अष्टमी और नवमी पर विशेष पूजा-अर्चना होती है। मंदिर की एक प्रमुख परंपरा बलि प्रदान भी है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, नवरात्र के दौरान यहां बड़ी संख्या में पाठों की बलि दी जाती है। इस परंपरा के कारण भी मंदिर की चर्चा दूर-दूर तक होती है।अष्टमी के अवसर पर यहां तांत्रिक साधना करने वाले साधकों के पहुंचने की भी मान्यता है। वहीं, आम श्रद्धालु माता के दर्शन, पूजा-अर्चना और मन्नत मांगने के लिए घंटों कतार में खड़े रहते हैं।

नवरात्र में हर दिन उमड़ती है आस्था
तिलडीहा दुर्गा मंदिर में नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार बढ़ती है। पहली पूजा से शुरू हुआ भक्तों का सैलाब अष्टमी और नवमी के अवसर पर और बढ़ने की उम्मीद रहती है। दूर-दराज से आने वाले भक्तों के लिए माता का दरबार केवल पूजा का स्थल नहीं, बल्कि विश्वास, परंपरा और आध्यात्मिक जुड़ाव का केंद्र है।मां भगवती के प्रति इसी अटूट आस्था के कारण तिलडीहा दुर्गा मंदिर बिहार के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में अपनी खास पहचान रखता है।

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