सलाखों के पीछे गूंजे सोहर और मंगल गीत, कैदियों ने नवजात को दिया आशीर्वाद; छठी पूजन में जेल की चारदीवारी बनी परिवार का आंगन

 

हजारीबाग। सेंट्रल जेल की ऊंची दीवारें, लोहे के दरवाजे और सुरक्षा के बीच आमतौर पर जहां बंदियों की दिनचर्या अनुशासन और बंदिशों में गुजरती है, वहीं उस दिन महिला वार्ड का नजारा बिल्कुल अलग था। यहां सलाखों के पीछे कैद महिलाओं के चेहरों पर मुस्कान थी, वातावरण में सोहर और मंगल गीतों की गूंज थी और महिला वार्ड फूलों व रंग-बिरंगे गुब्बारों से सजा हुआ था। मौका था एक महिला बंदी के नवजात बच्चे के जन्म के छठे दिन आयोजित छठियारी यानी छठी पूजन का।

यह सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि उन महिलाओं के लिए भावनाओं से जुड़ा ऐसा पल था, जिसमें उन्होंने अपनी साथी बंदी के दुख-दर्द को कुछ देर के लिए पीछे छोड़कर उसके बच्चे की खुशी को अपनी खुशी की तरह मनाया। जेल की चारदीवारी के भीतर साथी महिला बंदियों ने मां और नवजात को परिवार जैसा अपनापन दिया।

छठी पूजन के दौरान महिला बंदियों ने पारंपरिक सोहर और मंगल गीत गाए। किसी ने नवजात को गोद में लेकर दुलार किया तो किसी ने उसके स्वस्थ और उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए आशीर्वाद दिया। कुछ देर के लिए ऐसा लगा मानो जेल की दीवारें भी इस खुशी के सामने छोटी पड़ गई हों।जिन महिलाओं की अपनी जिंदगी अलग-अलग परिस्थितियों में जेल की चारदीवारी तक पहुंची है, वे उस दिन एक-दूसरे के लिए सहारा बनी नजर आईं। किसी ने सजावट में हाथ बंटाया तो किसी ने गीत गाए। किसी ने मां और बच्चे के लिए शुभकामना दी तो किसी ने बच्चे को नए कपड़ों और खिलौनों से खुश करने की कोशिश की।

जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य का भी रखा गया ख्याल
आयोजन के दौरान जेल प्रशासन की ओर से जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य की जांच कराई गई। कारा अधीक्षक, जेलर और जेल प्रशासन के अधिकारियों ने मां और नवजात का हाल जाना तथा स्वास्थ्य संबंधी जरूरी जानकारी ली।नवजात के लिए नए कपड़े और खिलौने भी दिए गए। बच्चे को उपहार मिलने के बाद मां के चेहरे पर आई खुशी ने वहां मौजूद लोगों को भावुक कर दिया। बंदियों और जेलकर्मियों के बीच भी उस समय एक अलग तरह का भावनात्मक माहौल दिखाई दिया।

अधीक्षक और जेलर ने खुद परोसा खाना
छठियारी के अवसर पर महिला बंदियों के लिए विशेष भोजन की व्यवस्था की गई थी। कारा अधीक्षक सीएस सुमन और जेलर ने खुद भोजन परोसकर आयोजन को महज औपचारिकता नहीं रहने दिया, बल्कि उसमें आत्मीयता जोड़ दी।अधिकारियों को अपने बीच भोजन परोसते देख महिला बंदियों में भी उत्साह नजर आया। जेल प्रशासन और बंदियों के बीच उस समय का माहौल किसी अधिकारी और बंदी के औपचारिक रिश्ते से आगे बढ़कर मानवीय संवेदना और अपनत्व का नजर आया।

सलाखों के पीछे भी धड़कता है दिल
जेल में बंद होना किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीन सकता है, लेकिन उसके भीतर की ममता, संवेदना और रिश्तों की भावनाओं को खत्म नहीं करता। छठियारी का यह आयोजन इसी मानवीय पहलू की तस्वीर बनकर सामने आया।जिस महिला के लिए यह खुशी का मौका था, उसके अपने लोग भले ही उससे दूर हों, लेकिन उस दिन जेल में रहने वाली उसकी साथी महिलाओं ने उस कमी को महसूस नहीं होने दिया। उन्होंने नवजात की खुशी को अपनी खुशी बनाया और मां के साथ खड़ी रहीं।

सेंट्रल जेल की चारदीवारी के भीतर हुआ यह छोटा-सा आयोजन इस बात का एहसास करा गया कि कैदी होने से इंसान की भावनाएं कैद नहीं होतीं। उस दिन ऊंची दीवारों के बीच बंदिशों से ज्यादा रिश्तों की गर्माहट थी और जेल के महिला वार्ड में गूंज रहे सोहर ने माहौल को कुछ देर के लिए घर-आंगन जैसा बना दिया।

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