निशा भगत की मौत पर आदिवासी समाज में उबाल, 7 नवंबर को गुमला बंद का ऐलान; महेंद्र उरांव ने भरी हुंकार

 

गुमला। चर्चित आदिवासी नेत्री निशा भगत की मौत को लेकर गुमला में आक्रोश गहराने लगा है। घटना के विरोध में अब आंदोलन की आवाज बुलंद होने लगी है। इसी कड़ी में 7 नवंबर को गुमला जिला बंद का आह्वान किया गया है। कहतो मूली पड़हा, गुमला की ओर से महेंद्र उरांव ने बंद का ऐलान करते हुए आदिवासी समाज और आम लोगों से इसमें सहयोग करने की अपील की है।

निशा भगत की मौत के बाद से ही आदिवासी समाज में शोक के साथ-साथ गहरी नाराजगी देखी जा रही है। समाज के लोगों के बीच इस घटना की परिस्थितियों को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। लोग पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और सच्चाई सामने लाने की मांग कर रहे हैं। अब 7 नवंबर को गुमला बंद के जरिए इसी आक्रोश को आवाज देने की तैयारी है।

निशा भगत की मौत ने खड़ा किया बड़ा सवाल

आदिवासी समाज से जुड़े हक-अधिकार, जमीन और जनजातीय मुद्दों पर मुखर रहने वाली निशा भगत के निधन ने सामाजिक और राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। उनकी मौत के बाद सामने आए अंतिम संदेश और उसमें लगाए गए आरोपों को लेकर भी चर्चा तेज है। विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की ओर से मामले की निष्पक्ष जांच कराने तथा आरोपों की सच्चाई सामने लाने की मांग उठाई जा रही है। हालांकि, अंतिम संदेश में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।

बंद के ऐलान से गुमला में बढ़ी हलचल

कहतो मूली पड़हा के महेंद्र उरांव की ओर से बंद का आह्वान ऐसे समय में किया गया है, जब निशा भगत की मौत को लेकर राज्य के अलग-अलग हिस्सों में प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। बंद का असर 7 नवंबर को गुमला के बाजारों, दुकानों और सामान्य जनजीवन पर पड़ सकता है। हालांकि, बाजार, यातायात और आवश्यक सेवाओं को लेकर बंद समर्थकों की ओर से विस्तृत दिशा-निर्देश सामने नहीं आया है।

फिलहाल निशा भगत की मौत को लेकर उठ रहे सवालों के बीच 7 नवंबर का गुमला बंद अहम माना जा रहा है। अब देखना होगा कि बंद के दौरान लोगों की कितनी भागीदारी रहती है और प्रशासन की ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए क्या इंतजाम किए जाते हैं।

 

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