जिसे मरा समझा, वो जिंदा निकली…गोरखपुर की प्रीति ने याद दिलाया राँची का वो कांड, जिसमें बेगुनाह काट गया जेल…
–गोरखपुर में मृत मान ली गई युवती गुजरात में मिली जिंदा, तो याद आया राँची का चर्चित ‘फर्जी प्रीति हत्याकांड’; गलत पहचान, थर्ड डिग्री और बेगुनाह की जिंदगी बर्बाद होने की कहानी ने फिर खड़े किए सवाल–
राँची/गोरखपुर। कभी किसी परिवार की दुनिया उजड़ जाती है, कभी किसी बेगुनाह की जिंदगी सलाखों के पीछे बर्बाद हो जाती है और कभी पुलिस की जांच ही ऐसे सवालों के घेरे में आ जाती है, जिनका जवाब वर्षों तक तलाशा जाता है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में तीन साल से लापता युवती प्रीति के जिंदा मिलने और झाड़ियों में मिले एक अज्ञात युवती के शव की पहचान को लेकर उठे सवालों ने ऐसी ही एक पुरानी कहानी को फिर चर्चा में ला दिया है। यह कहानी झारखण्ड की राजधानी राँची के चर्चित ‘फर्जी प्रीति हत्याकांड’ की है, जिसमें जिस युवती की हत्या मानकर पुलिस ने कार्रवाई की थी, वही बाद में जिंदा अपने घर लौट आई। लेकिन तब तक हत्या के आरोप में गिरफ्तार किए गए युवकों की जिंदगी में कानून की कार्रवाई और पुलिसिया जांच के गंभीर परिणाम सामने आ चुके थे।
गोरखपुर और राँची के दोनों मामले अलग-अलग राज्यों, अलग-अलग परिस्थितियों और अलग-अलग समय के हैं। इनके बीच सीधा संबंध होने का कोई आधार नहीं है। फिर भी दोनों घटनाएं एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा करती हैं ,जब किसी लापता व्यक्ति की पहचान गलत हो जाए, तो पुलिस की जांच, वैज्ञानिक साक्ष्य और कानूनी प्रक्रिया की जिम्मेदारी कितनी महत्वपूर्ण हो जाती है?
एक मामले में मृत समझी गई युवती के जिंदा मिलने के बाद अब अज्ञात शव की पहचान नए सिरे से करनी पड़ रही है। दूसरे मामले में गलत पहचान के आधार पर हत्या का आरोप झेलने वाले युवक को न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। राँची के मामले में झारखण्ड हाईकोर्ट ने पीड़ित अजीत कुमार को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश भी दिया था।
गोरखपुर में मृत समझी गई प्रीति गुजरात में मिली जिंदा
गोरखपुर के गुलरिहा क्षेत्र में 30 सितंबर 2026 को झाड़ियों से एक युवती का शव बरामद हुआ था। शव मिलने के बाद उसकी पहचान को लेकर पुलिस ने जांच शुरू की। इसी दौरान प्रयागराज के लालगोपालगंज क्षेत्र के उमरावगंज निवासी परिवार को सूचना दी गई। परिवार की बेटी प्रीति 13 मई 2023 से लापता थी। काफी समय तक उसकी तलाश करने के बावजूद परिजनों को उसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली थी।गोरखपुर पुलिस की सूचना पर प्रीति की मां कमला देवी, चचेरा भाई जितेंद्र और भाभी वहां पहुंचे। शव की नाक पर तिल और जलने के निशान जैसे शारीरिक लक्षणों के आधार पर परिजनों ने उसकी पहचान प्रीति के रूप में की। इसके बाद परिवार ने उसे अपनी बेटी मान लिया। मां का डीएनए नमूना भी लिया गया था, जिसकी रिपोर्ट आने की बात कही गई।परिवार के लिए यह बेहद दुखद स्थिति रही होगी। तीन साल से लापता बेटी के बारे में कोई खबर नहीं थी। फिर एक दिन पुलिस ने बताया कि शव मिला है। परिजनों ने उसे अपनी बेटी मानकर अंतिम संस्कार कर दिया और तेरहवीं तक कर चुके थे।लेकिन 24 अक्टूबर 2026 को कहानी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसने पूरे मामले को नई दिशा दे दी। प्रयागराज पुलिस की ओर से प्रीति की मां को जानकारी दी गई कि उनकी बेटी गुजरात के एक नारी संरक्षण केंद्र में सुरक्षित है।
बताया गया कि प्रीति पांच अगस्त 2023 को बड़ौदा में रेलवे स्टेशन के बाहर लावारिस हालत में मिली थी। इसके बाद वह संरक्षण केंद्र में रही। अब उसके जिंदा होने की जानकारी सामने आने के बाद गोरखपुर में मिले शव की पहचान पर सवाल खड़े हो गए हैं।जिस शव को परिवार अपनी बेटी का मानकर अंतिम संस्कार कर चुका था, वह आखिर किसका था? क्या पहचान के दौरान कोई महत्वपूर्ण तथ्य छूट गया? क्या वैज्ञानिक जांच से पहले ही पहचान को अंतिम मान लिया गया था? इन सवालों के जवाब अब नए सिरे से तलाशे जाने हैं।गोरखपुर पुलिस के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती उस अज्ञात युवती की पहचान करना है, जिसका शव 30 सितंबर को बरामद हुआ था। डीएनए जांच की रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों से ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
राँची में भी जिंदा लौट आई थी प्रीति, लेकिन बेगुनाहों की जिंदगी बदल चुकी थी
गोरखपुर की घटना ने राँची के फरवरी 2014 के उस मामले की याद ताजा कर दी, जिसने झारखण्ड पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।राँची के चुटिया की रहने वाली प्रीति नाम की युवती 15 फरवरी 2014 को लापता हो गई थी। अगले दिन, 16 फरवरी को बुंडू क्षेत्र से एक युवती का जला हुआ शव बरामद हुआ। शव की हालत ऐसी थी कि उसकी पहचान करना आसान नहीं था। पोस्टमार्टम में हत्या के बाद शव जलाए जाने की बात सामने आई थी।शव की पहचान को लेकर पुलिस ने प्रीति के परिजनों से संपर्क किया। कद-काठी और दूसरे शारीरिक लक्षणों में समानता के आधार पर परिजनों ने शव को प्रीति का होने की आशंका जताई। इसके बाद पुलिस ने उसे प्रीति का शव मानकर जांच आगे बढ़ाई।यहीं से मामले ने गंभीर मोड़ ले लिया। आरोप है कि शव की पहचान को लेकर पर्याप्त वैज्ञानिक पुष्टि किए बिना पुलिस ने हत्या के मामले में तीन युवकों को गिरफ्तार कर लिया। इनमें अजीत कुमार भी शामिल थे।मामले में आरोपी बनाए गए युवकों के खिलाफ कार्रवाई हुई और उन्हें जेल जाना पड़ा। बाद में जिस युवती की हत्या का मामला बताया जा रहा था, वही प्रीति जिंदा अपने घर लौट आई। इससे पूरे मामले की बुनियाद ही सवालों के घेरे में आ गई।जिस हत्या के आरोप में पुलिस ने युवकों को गिरफ्तार किया था, उसमें कथित मृतका का जिंदा मिलना इस बात का संकेत था कि शव की पहचान में गंभीर गलती हुई थी। इसके बाद मामले की जांच सीआईडी को सौंपी गई।
थर्ड डिग्री और कबूलनामे के आरोप ने मामले को बनाया और गंभीर
राँची के इस मामले में पुलिस की कार्यशैली पर केवल गलत पहचान को लेकर ही सवाल नहीं उठे थे। पीड़ित पक्ष की ओर से आरोप लगाया गया कि पुलिस ने गिरफ्तार युवकों के साथ थर्ड डिग्री का इस्तेमाल किया और उनसे अपराध कबूल करवाने की कोशिश की।ऐसे आरोप किसी भी आपराधिक जांच को गंभीर सवालों के घेरे में खड़ा करते हैं। किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करना, उससे पूछताछ करना और उसके खिलाफ आरोप साबित करना—तीनों अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। किसी भी आरोपी का कथित कबूलनामा अपने आप में वैज्ञानिक साक्ष्य और निष्पक्ष जांच का विकल्प नहीं हो सकता।इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही था कि अगर शव की पहचान को लेकर वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई थी, तो हत्या की जांच किस आधार पर आगे बढ़ी? क्या अन्य साक्ष्यों की पर्याप्त जांच की गई थी? और यदि युवती जिंदा थी, तो उन युवकों को हत्या के मामले में आरोपी बनाने की प्रक्रिया में इतनी बड़ी चूक कैसे हुई?सीआईडी की जांच के बाद तत्कालीन अनुसंधानकर्ता सुरेंद्र कुमार, चुटिया के तत्कालीन थाना प्रभारी कृष्ण मुरारी और बुंडू के तत्कालीन थाना प्रभारी संजय कुमार को निलंबित किए जाने की जानकारी सामने आई थी। जांच में तीनों पर सही तरीके से जांच किए बिना युवकों को गिरफ्तार कर जेल भेजने को लेकर कार्रवाई हुई थी।
यह प्रकरण इस बात की याद दिलाता है कि पुलिस की शुरुआती जांच में हुई एक बड़ी गलती केवल केस डायरी या विभागीय रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रहती। उसका असर उन लोगों की पूरी जिंदगी पर पड़ सकता है, जिन्हें गलत तरीके से आरोपी बना दिया जाता है।
हाईकोर्ट पहुंचा मामला, बेगुनाह अजीत को पांच लाख रुपये मुआवजे का आदेश
राँची के कथित फर्जी प्रीति हत्याकांड में न्याय पाने के लिए अजीत कुमार को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। उन्होंने पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई और मुआवजे की मांग को लेकर झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।सुनवाई के दौरान प्रार्थी की ओर से दलील दी गई कि पुलिस की लापरवाही के कारण उनका करियर प्रभावित हुआ और उन्हें गंभीर नुकसान उठाना पड़ा। उनके पक्ष में यह भी कहा गया कि जेल जाने और हत्या के आरोप का सामना करने के कारण उनकी जिंदगी पर गहरा असर पड़ा।मामले की सुनवाई के बाद झारखण्ड हाईकोर्ट ने राज्य के गृह विभाग को अजीत कुमार को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था। अदालत की टिप्पणी का सार यह था कि सही तरीके से जांच किए बिना किसी व्यक्ति को जेल भेजना गंभीर मामला है।यह आदेश केवल आर्थिक मुआवजे तक सीमित एक घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह सवाल भी उठाता है कि गलत जांच के कारण किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, स्वतंत्रता और भविष्य प्रभावित हो जाए, तो उसकी भरपाई कैसे होगी?पांच लाख रुपये का मुआवजा उस समय के नुकसान की पूरी भरपाई कर सकता है या नहीं, यह अलग बहस है। लेकिन इस मामले ने पुलिस जांच में जवाबदेही की जरूरत को जरूर सामने रखा।
दोनों घटनाओं में समानता क्या, और अंतर कहां?
गोरखपुर और राँची की घटनाओं में सबसे बड़ी समानता गलत पहचान की आशंका और उसके गंभीर परिणाम हैं। दोनों मामलों में एक युवती की पहचान को लेकर ऐसी स्थिति बनी, जिसने पूरे मामले की दिशा बदल दी।गोरखपुर में प्रीति को मृत समझ लिया गया, जबकि वह गुजरात में जीवित मिली। अब बरामद शव की वास्तविक पहचान करना पुलिस के सामने चुनौती है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इस मामले में शव की पहचान को लेकर नई जांच की जरूरत है। किसी की गिरफ्तारी न होने की बात को भी पूरे मामले के आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही अंतिम रूप से कहा जा सकता है।
राँची के मामले में स्थिति इससे अलग थी। यहां गलत पहचान के बाद हत्या के आरोप में युवकों को गिरफ्तार किया गया था। प्रीति के जिंदा लौटने के बाद पुलिस की कार्रवाई और जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठे। बाद की जांच और हाईकोर्ट की कार्यवाही ने मामले को एक अलग कानूनी मोड़ दिया।इसलिए दोनों घटनाओं को एक जैसा अपराध या एक ही तरह की पुलिस कार्रवाई मानना उचित नहीं होगा। लेकिन दोनों से यह सीख जरूर मिलती है कि शव की पहचान में संदेह हो, तो केवल कद-काठी या परिजनों की आशंका को अंतिम मान लेने के बजाय डीएनए और दूसरे उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों की मदद लेना कितना जरूरी है।
पुलिस की कार्यशैली पर फिर बहस, वैज्ञानिक जांच ही सबसे मजबूत आधार
आपराधिक मामलों में पुलिस पर अपराधी की पहचान करने और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की जिम्मेदारी होती है। लेकिन जल्दबाजी में निकाला गया निष्कर्ष जांच को गलत दिशा में ले जा सकता है। शव की पहचान, घटनास्थल से मिले साक्ष्य, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, डीएनए परीक्षण और गवाहों के बयान,इन सभी को एक-दूसरे के साथ मिलाकर देखना जरूरी होता है।
गोरखपुर का मामला अब यह सवाल उठा रहा है कि अज्ञात शव की पहचान की प्रक्रिया में किन स्तरों पर सावधानी बरती गई थी। वहीं राँची का पुराना मामला दिखाता है कि गलत पहचान के आधार पर हुई गिरफ्तारी का असर कितना दूरगामी हो सकता है।
किसी भी पुलिस अधिकारी पर केवल संदेह या आरोप के आधार पर दोष तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए जांच, विभागीय कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन जहां गलत पहचान के कारण किसी बेगुनाह को जेल जाना पड़े, वहां जवाबदेही तय करना न्याय व्यवस्था का अहम हिस्सा है।
12 साल बाद फिर वही सवाल: गलती की कीमत कौन चुकाएगा?
राँची का फर्जी प्रीति हत्याकांड करीब 12 साल पुरानी घटना है। वक्त बीत गया, मामला अदालत तक पहुंचा और मुआवजे का आदेश भी आया। लेकिन इस घटना की चर्चा आज भी इसलिए प्रासंगिक है, क्योंकि गलत पहचान और जल्दबाजी में की गई जांच किसी भी समय किसी परिवार को गहरे संकट में डाल सकती है।
गोरखपुर में प्रीति के जिंदा मिलने से एक परिवार को यह राहत मिली कि उनकी बेटी जीवित है। लेकिन उसी घटना ने झाड़ियों में मिले शव की पहचान को और उलझा दिया। अब उस अज्ञात युवती की पहचान और उसकी मौत की परिस्थितियों का पता लगाना भी उतना ही जरूरी है।
राँची में प्रीति के जिंदा लौटने तक कुछ युवकों को हत्या के आरोप का सामना करना पड़ा था। अजीत कुमार के मामले में हाईकोर्ट का मुआवजा आदेश इस बात का उदाहरण है कि गलत जांच के खिलाफ न्याय पाने के लिए पीड़ित को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ सकती है।
दोनों घटनाएं एक ही संदेश देती हैं,किसी को मृत घोषित करने से पहले पहचान की पुष्टि और किसी को हत्यारा ठहराने से पहले ठोस साक्ष्य जरूरी हैं। पुलिस की तत्परता तभी सार्थक है, जब उसके साथ निष्पक्षता, वैज्ञानिक जांच और जवाबदेही भी हो। वरना एक गलत पहचान किसी परिवार से उसकी उम्मीद छीन सकती है और किसी बेगुनाह की पूरी जिंदगी बदल सकती है।

