शिबू सोरेन की अंतिम विदाई:रामगढ़ जिला प्रशासन की अव्यवस्था से समर्थकों में गुस्सा, आक्रोश और अफसोस…

 

राँची/रामगढ़।दिशोम गुरु शिबू सोरेन पंचतत्व में विलीन हो गये. उनके पैतृक गांव नेमरा के मांझी टोला में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के सर्वोच्च नेता को श्रद्धांजलि देने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा था।पहाड़ से, खेत से, जंगल से, शहरों से गांवों से लोग नेमरा की ओर बढ़ रहे थे।सुबह 9 बजे से लोगों के आने का सिलसिला शुरू हुआ और रात के 9 बजे के बाद भी आने का सिलसिला जारी रहा। आम आदमी से लेकर वीआईपी और वीवीआईपी तक गुरुजी को श्रद्धासुमन अर्पित करने के लिए पहुंचे।भारी बारिश के बीच झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने पिता को मुखाग्नि दी। इससे पहले 2 बजे से 2:30 बजे के बीच जब शिबू सोरेन का पार्थिव शरीर उनके पैतृक आवास पर पहुंचा, तब हजारों झामुमो समर्थक उनकी एक झालक पाने को बेताब थे। झारखण्ड के कोने-कोने से लोग आये थे और शिबू सोरेन को श्रद्धांजलि देना चाहते थे।उनको नमन करना चाहते थे।

शिबू सोरेन के आवास में उनका पार्थिव शरीर था और बाहर दो गेट पर लोगों को अंदर जाने से रोका जा रहा था।महत्वपूर्ण लोग, जिसमें मंत्री, विधायक और बड़े अधिकारी शामिल थे, को भीड़ को चीरकर अंदर ले जाया जा रहा था।लोगों ने कहा कि ऐसा माहौल बन गया था, मानो दम घुट जायेगा।हालांकि, समर्थकों ने काफी संयम बरता।

बावजूद इसके कम से कम 3 बार ऐसी नौबत आयी कि भगदड़ मच जायेगा। जगह छोटी थी, लोग ज्यादा। व्यवस्था कम।अगर प्रशासन चाहता, तो नेमरा पहुंचा एक-एक शख्स दिशोम गुरु शिबू सोरेन को श्रद्धांजलि दे सकता था।मेन गेट से लोग लाइन लगाकर अंदर जाते और दूसरी तरफ के गेट से बाहर निकल सकते थे। पर ऐसा नहीं हुआ।

रामगढ़ प्रशासन ने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया कि सबको दर्शन सुलभ हो।इसलिए झामुमो कार्यकर्ताओं और शिबू सोरेन को प्यार करने वाले लोगों का कई बार गुस्सा भड़का।उन्होंने गेट के पास तैनात पुलिसकर्मियों को खरी-खोटी सुनायी।पुलिस वाले उन्हें यही कहते रहे कि अंदर से लोग बाहर निकलेंगे, तो आपको जाने दिया जायेगा।गुरुजी की अंतिम यात्रा निकल गयी, लेकिन हजारों लोगों को अंदर नहीं जाने दिया गया।

प्रशासन की अव्यवस्था की वजह से इन लोगों को भारी परेशानियों के साथ-साथ निराशा झेलनी पड़ी। शिबू सोरेन से साथ काम कर चुके कई लोग गुरुजी का अंतिम दर्शन नहीं कर पाये। ऐसे लोगों के मन में रामगढ़ प्रशासन के प्रति गुस्सा और आक्रोश था। उन्हें इस बात का अफसोस भी था कि वे अपने प्रिय नेता को आखिरी बार देख भी न पाये।

गिरिडीह के रहने वाले पौलुष सुरीन ने कहा कि वह 1972 से गुरुजी के साथ काम कर रहे हैं। गुरुजी ने आदिवासी, दलित और गरीबों को उनका अधिकार दिलाने के लिए बहुत काम किया। पौलुष भी उनके निर्देशन में काम करते थे।गिरिडीह से नेमरा गांव पहुंचे थे कि गुरुजी को अंतिम बार देख लेंगे।उनको नमन करेंगे।अपनी श्रद्धांजलि देंगे, लेकिन ऐसा मौका नहीं मिला।

निराश भाव से पौलुष सुरीन ने कहा कि सोचा था शिबू सोरेन को श्रद्धांजलि देंगे,लेकिन इतनी भीड़ हपुलिस वाले जाने नहीं दे रहे।शायद उनको श्रद्धांजलि न दे पाऊं।उनके पार्थिव देह पर पुष्प न चढ़ा पाऊं।जब अंतिम संस्कार होगा, वहां की मिट्टी को प्रणाम कर लूंगा।यही गुरुजी को मेरी श्रद्धांजलि होगी। यह कहते हुए उनकी आंखें नम हो गयीं।

लोगों की गाड़ियों को 7-8 किलोमीटर पहले रोक दिया

अलग-अलग जिलों से पहुंचने वाले लोगों को उस वक्त सबसे ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ा, जब उन्हें नेमरा से करीब 8 किलोमीटर पहले रोक दिया गया।उनकी गाड़ी वहीं खड़ी कर दी गयी।लोगों से कहा गया कि प्रशासन की गाड़ी उन्हें गांव तक पहुंचा देगी बहुत से लोगों को गाड़ी मिली और उन्हें शिबू सोरेन के घर से करीब डेढ़-दो किलोमीटर पहले छोड़ दिया गया।इसके बाद लोगों को पैदल जाना पड़ा।

7-8 किलोमीटर पैदल चलकर नेमरा पहुंचे लोग

शिबू सोरेन के पार्थिव शरीर के इस बैरिकेड को पार करते ही वहां से लोगों को आगे जाने के लिए वाहन की सुविधा बंद कर दी गयी. यानी 7-8 किलोमीटर पैदल चलकर आप शिबू सोरेन को श्रद्धांजलि देने और उनकी अंत्येष्टि में जायें। हालांकि, वीआईपी की गाड़ियों को आगे तक जाने का अवसर दिया गया। शिबू सोरेन के प्रति लोगों का प्यार ऐसा था कि वे 8 किलोमीटर पैदल चलकर उनके घर पहुंचे।उन्हें श्रद्धांजलि देने के बाद फिर 7-8 किलोमीटर पैदल चलकर चेक पोस्ट तक लौटे।

अंत्येष्टि के बाद सड़क जाम में घंटों फंसे रहे लोग

अंत्येष्टि संपन्न होने के बाद लोगों की वापसी शुरू हुई, तो सड़क पर अव्यवस्था का आलम यह था कि वाहन रेंगते रहे।बारिश के बीच लोग सड़क पर फंसे रहे। 10 मिनट की यात्रा 3 घंटे में पूरी हुई।मंत्री से लेकर तमाम बड़े लोग उस जाम में फंसे रहे। सांसद, विधायक, झामुमो के नेता और कार्यकर्ता सबकी गाड़ियां फंसी रहीं करीब 10 किलोमीटर लंबा जाम लग गया और हजारों गाड़ियां फंसी रहीं।

जाम के बीच मथुरा महतो को आयी गुरुजी के साथ आंदोलन के दिनों की याद

झामुमो के राष्ट्रीय महासचिव और मुख्य प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य गाड़ी उतरकर पैदल चलने लगे। उन्हें देखकर मथुरा महतो भी कार से उतर गये। मथुरा महतो को गुरुजी के साथ आंदोलन के पुराने दिन याद आ गये।उन्होंने कहा कि जिस तरह गुरुजी वर्षा-आंधी के बीच आंदोलन करते थे, आज भी वैसा ही दिन है। गुरुजी की अंत्येष्टि हुई और इतनी भारी बारिश हो रही है।

जमशेदपुर से आयीं सोरेन के रिश्तेदारों को भी नहीं मिली एंट्री

शिबू सोरेन के परिवार से जुड़ी कुछ महिलाएं जमशेदपुर से आयीं थीं।जब तक शवयात्रा नहीं निकली, तब तक उनको भी अंदर नहीं जाने दिया गया।इतना सब होने के बावजूद लोगों ने अपने प्रिय नेता शिबू सोरेन को अश्रुपूरित नेत्रों से श्रद्धांजलि दी। भारी बारिश के बीच शिबू सोरेन को हेमंत सोरेन ने मुखाग्नि दी और वहां मौजूद हजारों लोगों ने उन्हें वीर शिबू अमर रहे के जयघोष के साथ उनको अंतिम विदाई दी।
साभार:

error: Content is protected !!