Ranchi:जय जगन्नाथ की गूंज के बीच भगवान तीनों स्वरूप लौटे अपने धाम,घूरती रथयात्रा में श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़…

राँची।झारखण्ड की राजधानी राँची में आस्था और भक्ति का सागर उस समय उमड़ पड़ा, जब भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ नौ दिनों के विश्राम के बाद मौसीबाड़ी से वापसी कर अपने मुख्य मंदिर लौटे। ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर परिसर और उसके रास्तों में “जय जगन्नाथ” की गूंज से वातावरण भक्तिमय हो उठा।बारिश की फुहारों के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता था। न भीगने की चिंता, न रास्तों की परवाह – भक्तों का उत्साह हर मौसम पर भारी पड़ा।भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का यह दूसरा चरण, जिसे घूरती यात्रा कहा जाता है, हर साल आषाढ़ शुक्ल दशमी को मनाया जाता है। नौ दिनों तक भगवान तीनों स्वरूपों ने मौसीबाड़ी में विश्राम किया, जहां विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन हुआ। इस दौरान श्रद्धालु बड़ी संख्या में दर्शन के लिए पहुंचे और मनोवांछित फल की कामना की।

रथ पर विराजमान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की वापसी यात्रा के लिए शहर भर से श्रद्धालु जगन्नाथपुर मंदिर परिसर पहुंचे। हजारों की संख्या में भक्त रथ को खींचने के लिए उमड़ पड़े। जैसे ही भगवान का रथ मंदिर के मुख्य द्वार की ओर बढ़ा, लोगों की आंखें श्रद्धा और आनंद से भर आईं।

पूरे आयोजन के दौरान मेले जैसा माहौल बना रहा। मंदिर परिसर और मौसीबाड़ी के आस-पास सजे मेले में राज्यभर के साथ-साथ बिहार, ओड़िशा, बंगाल और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से आए स्टाल धारकों ने अपने-अपने उत्पादों की बिक्री की। हस्तशिल्प, मिठाइयां, झूले, खिलौने, पूजा सामग्री, लोक गीतों और झारखण्डी व्यंजनों के बीच लोगों ने भक्ति और मेले का भरपूर आनंद लिया।

मौसीबाड़ी से मुख्य मंदिर तक के मार्ग को रंग-बिरंगे पताकाओं, तोरण द्वारों और फूलों से सजाया गया था।चारों ओर गूंजते भजन, ढोल-नगाड़े और चांदनी की तरह चमकती रथ यात्रा ने हर किसी को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया. प्रशासन और स्थानीय समिति द्वारा सुरक्षा, यातायात, स्वच्छता और सुविधा प्रबंधन की विशेष व्यवस्था की गई थी। महिला श्रद्धालुओं, बुजुर्गों और बच्चों के लिए अलग से सुविधा केंद्र बनाए गए थे।

बारिश के बावजूद भक्तों के उत्साह में कोई कमी नहीं आई। छाते लेकर, रेनकोट पहनकर और कई तो भीगते हुए ही – हर कोई इस दिव्य क्षण का साक्षी बनने को आतुर दिखा। एक श्रद्धालु ने भावुक होकर कहा, “बारिश भगवान की कृपा है। उनके दर्शन के लिए यह सब सहर्ष स्वीकार है.”

जगन्नाथपुर मंदिर पहुंचने के बाद भगवान तीनों स्वरूपों का विशेष पूजन और आरती की गई।मंदिर प्रांगण में फूलों और रोशनी से की गई सजावट ने पूरे माहौल को स्वर्गिक बना दिया। भक्तों ने देर रात तक भजन-कीर्तन और भोग वितरण में भाग लिया।

जगन्नाथ यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का उत्सव बन चुकी है।हर वर्ष की तरह इस बार भी यह पर्व श्रद्धा, समर्पण और उल्लास का प्रतीक बना रहा।

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