चाइल्ड राइट फाउंडेशन के सचिव बैद्यनाथ कुमार की शिकायत पर एनएचआरसी की कार्रवाई:दोषी पुलिस अफसरों पर एफआईआर और पीड़ित नाबालिग को एक लाख मुआवजे की अनुशंसा…

 

राँची।झारखण्ड के खूंटी जिला बल के एएचटीयू थाने के तत्कालीन दरोगा संतोष रजक व अन्य पुलिसकर्मी को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने दोषी पाया है। आयोग ने इस मामले में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 18 के तहत सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। वहीं, मुख्य सचिव के माध्यम से आयोग ने पूछा है कि क्यों न नाबालिग पीड़ित को एक लाख रुपये के मुआवजे की अनुशंसा की जाए। इस संबंध में चार सप्ताह के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया गया है। आयोग ने चाइल्ड राइट्स फाउंडेशन राँची के सचिव बैद्यनाथ कुमार की शिकायत पर जांच में पाया है कि पीड़ित नाबालिग था और दोषी पुलिस अधिकारियों का कृत्य स्पष्ट रूप से भारतीय न्याय संहिता, 2023 और किशोर न्याय अधिनियम का उल्लंघन है।आयोग ने लिखा है कि दोषी पुलिस अफसर को निलंबित कर दिया गया है, लेकिन राज्य को उसके और अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करनी थी। आयोग ने खूंटी एसपी को निर्देश दिया है कि वे दोषी पुलिस अधिकारी और अन्य ग्रामीणों के खिलाफ पीड़ित बालक की पिटाई के लिए प्राथमिकी दर्ज करें और चार सप्ताह के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करें।

क्या है मामला:
शिकायतकर्ता बैद्यनाथ कुमार ने आयोग के सदस्य प्रियांक कानूनगो को लिखे पत्र में आरोप लगाया था कि 16 फरवरी 2025 को खूंटी जिले की पुलिस मानव तस्करी के संदिग्ध को गिरफ्तार करने के लिए एक गांव में गई थी, लेकिन वह नहीं मिला। इसके बजाय, उन्होंने संदिग्ध के घर में तोड़फोड़ की और उसके नाबालिग बच्चे को जबरन खूंटी महिला पुलिस थाने ले गई। वहां, पुलिस ने बच्चे को बुरी तरह पीटा, जिससे वह न तो बैठ सकता था और न ही खड़ा हो सकता था। घटना के बारे में बाद में बच्चे की मां ने अपने भाई को सूचित किया, जो पुलिस थाना गया। परिजन बच्चे को प्रारंभिक उपचार के लिए खूंटी और सत्ता के दुरुपयोग को उजागर किया।

आयोग ने जांच में क्या पाया:

आयोग ने जांच में पाया कि पुलिस अधिकारी एसआई संतोष रजक एएचटीयू थाना (खूंटी जिला), आरोपी को पकड़ने गए थे।आरोपी फरार पाया गया। तब पुलिस अधिकारी ने आरोपी के नाबालिग बेटे को पकड़ लिया और उसे पुलिस स्टेशन ले आया, जहां उसके पिता के ठिकाने की जानकारी देने के लिए उसकी पिटाई की गई। पुलिस अधिकारी ने स्वीकार किया कि पीड़ित को पुलिस स्टेशन लाया गया था, जबकि उसका मामले से कोई संबंध नहीं था। आयोग ने पाया है कि दोषी पुलिस अधिकारियों के इस कृत्य ने स्पष्ट रूप से पीड़ित के जीवन के अधिकार और सम्मान के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन किया, जिसके लिए राज्य के पदाधिकारी जिम्मेदार हैं और पीड़ित को मुआवजा प्रदान करने के लिए बाध्य हैं।

error: Content is protected !!